- डॉ. अमलदार ‘नीहार’
अवकाशप्राप्त प्रोफेसर – बलिया (उत्तर प्रदेश)
रजोजुषे जन्मनि सत्त्ववृत्तये स्थितौ प्रजानां प्रलये तमः स्पृशे।
अजाय सर्गस्थितिनाशहेतवे त्रयीमयाय त्रिगुणात्मने नमः।।
हिन्दी भावानुवाद
हे परमात्मन्! सृष्टि-समुद्भव तुझसे, पोषण, तुझमें लीन,
दृश्यमान जो जगत् चराचर, परिवर्तन मिस नित्य नवीन।
त्रिगुणमयी यह सत्ता तेरी–सृजन-नाश, फिर-फिर शृंगार।
विश्वकार! हे विश्व-नियन्ता! विश्वरूप को नमस्कार।।
उल्लिखित श्लोक में महाकवि वाणभट्ट ने जिसे नमस्कार किया है, वह कौन है? वे सृष्टि के जन्मकाल में रजोगुण-सम्पन्न ब्रह्मा, पालन-काल में सतोगुण-सम्पन्न विष्णु तथा विनाश काल में तमोगुण-सम्पन्न शिव के रूप में व्यक्त होने वाले, अर्थात् सर्ग-स्थिति-नाश के हेतु हैं, ऐसे त्रिगुणात्मक निर्विकार, अजन्मा परमेश्वर को वह नमस्कार करता है। एक साथ तीनों गुणों से युक्त वह महाशक्ति मेरी समझ से भगवान विश्वकर्मा ही हो सकते हैं, इस पर आगे विचार किया जायेगा।
यदि कोई प्रश्न करे कि आप कौन हैं तो क्या उत्तर देंगे आप? कोई दार्शनिक मुद्रा में ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘ईश्वरांश’ या ‘देही’ बताना चाहेगा तो कोई विवेकवान सावधान हो स्वयं को मनुष्य बतायेगा, किन्तु अधिकांश तो यही बताना चाहेंगे कि वे अमुक जाति-कुल के हैं या अमुक व्यक्ति के पुत्र हैं और उनका अमुक नाम है। बहुतों के नाम के साथ उनकी सामाजिक पहचान प्रायः लगी रहती है। प्राप्त उपाधियाँ नाम से पहले विषाण तत्त्व की तरह और जाति-नाम लांगूल तत्त्व की तरह नाम के पीछे। हम समझ सकते हैं कि मनुष्य के मस्तिष्क में पशुता का समावेश कैसे हुआ होगा। जिनके नाम के साथ अन्य पहचान नहीं लगी रहती, उनके प्रति लोगों के मन में एक कौतूहल का भाव छिपा रहता है अथवा संदेह का, हिकारत का, दुराव का। कई बार खुलकर बताना जरूरी हो जाता है तो कई बार पूछ लिया जाता है, फिर उसके बाद आपके साथ स्पृश्यास्पृश्य का व्यावहारिक मानक तय होता है। अर्थात् परिचय के आदान-प्रदान में दृष्टि प्रायः सामाजिक हुआ करती है-ज्ञान-अभिज्ञान और फिर प्रत्यभिज्ञान। व्यष्टि से समष्टि हो जाना ही परिचय है, जब आपके ‘स्व’ को चय(सामाजिक समूह) सुरक्षा-घेरे में ले लेता है तो वही ‘परिचय’ बन जाता है। हमारा तत्त्वबोध यह कहता है कि मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद नहीं है। सभी प्राणियों में वही अनन्त विभु परमात्मा अलग-अलग रूप-रंग आकार-प्रकार में चेतन रूप में अवस्थित है। जो विश्वात्मचेतस् हैं, वे सभी प्राणियों में साक्षात् परमात्मा के दर्शन कर सकते हैं। यदि धर्मग्रन्थों का सहारा लें तो हम सब एक ही विराट की इच्छा से अनेक ऋषि-महर्षियों अथवा आदम-हव्वा आदि की सन्तान होकर जन्मे हैं, किन्तु लाखों बरस के सृष्टि के विकास-क्रम के साथ हजारों साल की सभ्यता के इतने सोपान तय करने के बावजूद आज हम इतने धार्मिक विचारों, मत-मान्यताओं के खेमों में बँटे हुए हैं और आज भी सत्यमय ज्ञान के उस चरम बिन्दु तक नहीं पहुँच सके, जहाँ सारे भेद-भाव मिटाये जा सकते हैं। वर्चस्व की अन्धी लिप्सा ने मनुष्य को इतना स्वार्थी, लालची, अहंकारी तथा आत्मकेन्द्रित बना दिया है कि वह दूसरों को दबाने तथा कुचलने के अनगिन षड्यन्त्र रचता रहा है। लोग राजनीतिक शक्ति, ज्ञान और अर्थ की सत्ता के बल पर एक दूसरे के शोषक अथवा पोषक बन जाते हैं, बाकी सब कुछ भूल जाते हैं। इसलिए प्रत्येक शोषित-पीड़ित जाति को आज अपने जातीय गौरव के प्रतीकों को धर्मशास्त्रों के पुरातात्त्विक खण्डहरों में निगूढ़ अवशेषों-पोथियों और इतिहास की भूली-बिसरी वीथियों में तलाशने की जरूरत है। ज्ञान-विज्ञान के शिखर चूमने वाले भी प्रायः अपनी जातीय गौरव-दीप्ति तथा सांगठनिक एकता के अभाव में श्रीहीन व्यक्तित्त्व लिए उपेक्षा, अपमान तथा शोषण का शिकार बनाये जाते रहे हैं, बनाये जाते रहेंगे, इसलिए अपनी अस्मिता को बचाये रखने हेतु सामूहिक चेतना के साथ एक-दूसरे की खूबियों का प्रकाशन तथा प्रोत्साहनपूर्ण सम्मान देते रहना अति आवश्यक है। निस्सन्देह अपने प्रचण्ड पुरुषार्थ, अपराजेय विक्रम, अप्रतिम प्रतिभा और युयुत्सा भाव के कारण विश्वकर्मा समाज के कुछ गिने-चुने लोगों ने अपना मुकाम हासिल किया है, किन्तु बहुलांश में अब भी यह समाज उच्च शिक्षा से विमुख, श्रमजीवी वर्ग में बने रहने की नियति को स्वीकार करता हुआ बिना विशेष पहचान के जीवन काट ले जाता है। एकता के अभाव में क्वाचित्क प्रभु वर्ग द्वारा सदियों से इस्तेमाल किये जाते हुए निज स्वार्थ-पूर्ति हेतु बुद्धिधर्मा लोग भी मतिभ्रान्त हो दोलायमान रहते हैं।
यदि किसी भाषा के पास श्रेष्ठ साहित्य की दौलत नहीं होती, किसी साहित्य के पास उसके सांस्कृतिक वैभव का अभाव रहता है और उसकी संस्कृति के पास मानवीय मूल्य का कोई महत्त्व नहीं समझ लीजिए कि वह मूल्यविहीन संस्कृति, वह संस्कृतिविहीन साहित्य, दोनों अवश्यमेव नष्ट हो जाते हैं और वह भाषा भी एक दिन अस्तित्वविहीन हो लुप्त हो जाती है। उसी प्रकार जिस किसी जाति-समाज का गौरवपूर्ण इतिहास नहीं होता, उसके पास अपना साहित्य नहीं होता तो उसके वजूद को भी लोग कभी न कभी भूल ही जाते हैं। एक तीसरा सत्य और है, वह यह कि जिस जाति-समाज के लोग साहित्य तथा संधानपरक ज्ञान-विज्ञान से दूर-दूर रहते हैं, वे घनीभूत साहित्यिक संवेदना, जीवन के नैतिक मूल्य, आध्यात्मिक रत्न-वैभव, ऐतिहासिक गौरव-बोध तथा अपने सांस्कृतिक ज्ञान-अभिज्ञान से विच्छिन्न हो बिल्कुल निस्तेज, स्वाभिमानरहित, पदाक्रान्त, विपन्न और दीन-हीन होकर हाशिये पर धकेल दिये जाते हैं। कहीं भी उन्हें न कोई तेजोद्दीप्त पद का महत्त्व मिल पाता है न यथोचित सम्मान, इसे सर्वथा याद रखिए। सत्य यह है कि साम्प्रतिक व्यवहार-जगत् में सामाजिक दृष्टि से जो विश्वकर्मा-पुत्र हैं, वे प्रायः अपने गाँव-समाज में समुचित सम्मान से वंचित, परम्परा की लकीर पीटने वाले, साक्षरता और शिक्षा की सीमा-रेखा पर प्रायः पिछड़े हुए, परस्पर बिछुड़े हुए, बहुलांश में घोर अन्धविश्वासी बने हुए हैं। गतानुगतिक भाव से देश-दुनिया की वे न तो सही राजनीति समझ पाते हैं, न ज्ञान-गवाक्ष से किसी चीज़ की गहरी जानकारी के लिए कभी समुत्सुक। जो अपने वर्तमान से ही लगभग अनभिज्ञ हों तो सुदूर भविष्य की परिकल्पना वे भला कैसे कर सकते हैं? पूरी दुनिया में जहाँ कमज़ोर व्यक्ति/समाज के अस्तित्त्व को निर्मूल करने या उसकी वास्तविक पहचान मिटाने की लगातार पुरजोर साजिशें चल रही हैं, उसके उन्नयन के रास्ते बन्द किये जा रहे हों, वहाँ अतिरिक्त जागरूकता के साथ निज आत्म-गौरव की रक्षा के लिए अपनी जड़ों की तलाश आवश्यक है। आवश्यकता है इतिहास के सभी प्रकोष्ठों को खँगालने की और वर्तमान समाज के कोने-अँतरे में पड़े धूलि-धुसरित अनमोल रत्नों को पहचानने की। क्या आप जानते हैं कि वे विराट विश्वकर्मा कौन थे? पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि यह सवाल अपने गाँव में जाकर पूछिए, ठीक-ठीक उत्तर नहीं मिलेगा। पौराणिक देवताओं में वे कितने प्रभावशाली वैज्ञानिक, अभियन्ता तथा महानतम शिल्पी थे, कलाकार, अलौकिक शक्ति और ज्ञान के प्रकाश-पुंज सर्वकल्याणकर्ता देवता और मंत्रद्रष्टा ऋषि-महर्षि थे, हम ठीक से बिल्कुल नहीं जानते। जिनसे हम अपनी उज्ज्वल वंश-परम्परा को जोड़ते हैं, उनसे इस देश के लाखों-करोड़ों लोग अब भी अनभिज्ञ ही हैं। दर्शन और अध्यात्म की भूमि पर भले ही स्वयं को तत्त्वज्ञानी लोग ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘तत्त्वमसि’ और ‘ईशावास्यमिदं सर्वं’ अथवा ‘सर्वं खलु इदं ब्रह्म’ की घोषणा करते न थकते हों, पर आचरण में स्पष्टतः भेदभाव तो दिखायी ही देता है। आखि़र एक सभ्य समाज में भेड़ और भेड़िये जैसा अन्तर क्यों दिखायी देता है? ज्ञान के अभाव में सामान्य जन केवल आत्मसमर्पण करना जानता है। ज्ञान के अभाव में तर्क की तलवार कोई काम नहीं करती। कबीर ने कहा कि ‘जाति न पूछो साधु की पूछ लीजियो ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।’ कहाँ कौन तलवार का सही मोल लगाता है भाई! जाति है कि जाती नहीं। बहुत पीछे छूट गया ‘जाति-पाँति पूछै नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई।।’ इसको सुधार लीजिए अब और दृढ़ता के साथ कहिए-
‘जाति-धरम पूछै सब कोई। निरख अनय मानवता रोई।।
देखो जाति-धरम का धन्धा।
अन्धा गुरु, चेला भी अन्धा।
एक खु़दा के हैं सब बन्दे। अन्धे भक्त, पुजारी अन्धे।।’
ग़ौर से देखिए, असह्य और अनिर्वच वेदना का दंश लिए पदाक्रान्त समाज विवर्ण वदन निज सीस झुकाकर ही परित्राण पाता हैं या भुलावे के उपकार-बोझ मन पर लादे चुपचाप गुलामी स्वीकार कर लेता है। सदियों से उसे जी-तोड़ परिश्रम, कला-प्रतिभा, निश्छल प्रेम, सद्भाव-समर्पण का प्रतिफल भेदभाव तथा तिरस्कार मिलता रहा है, यह अकाट्य सत्य है। हालाँकि व्याकरण की तरह समाज के आचरण में भी यत्र-तत्र अपवाद भी दिखायी देते हैं, पर व्यापक समाज, देश और दुनिया में वह स्थायी भाव नहीं है। यूँ तो व्यापक समाज में हमें सबके साथ सहअस्तित्त्व, प्रेम और भाईचारा, सौहार्द-सहयोग, करुणा तथा संवेदना का बर्ताव करना ही चाहिए, पर अपने आत्मगौरव तथा स्वाभिमान की रक्षा स्वयं करनी चाहिए। जिन्होंने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की, उसका पोषण किया तथा आवश्यकता पड़ने पर सृष्टि के ही कल्याणार्थ पुनर्सृजन हेतु अमोघ अस्त्र-शस्त्रों से लैस किया देव-शक्तियों को, जिनके निर्मित आयुध से भगवान शंकर, विराट विष्णु तथा स्वर्गाधिपति इन्द्र सहित अनेक देवी-देवता परम शक्तिशाली बन गये, जिन्होंने परम तेजस्वी जगत्प्रकाशक जामाता विवस्वान को अपनी पुत्री के अनुकूल बनाने के लिए अत्यन्त लघु तथा सुन्दर स्वरूप प्रदान किया, जो अनेक देवताओं के सगे सम्बन्धी थे, उनके अंशजों और वंशजों को दैन्य, दासता तथा दरिद्रता के दलदल में धकेलने का कुत्सित प्रयास कब, क्यों और किस युग में शुरू हुआ होगा, इसकी पड़ताल करनी चाहिए। मूल को छोड़ देना ही शूल का कारण बन गया और हम पिछलग्गू बनकर रह गये। इसलिए विज्ञान-बुद्धि-सम्मत होते हुए भी हमें उन मिथकीय आख्यानों में प्रयुक्त प्रतीकों के रहस्य को जानने का यत्न भी करना होगा।
वास्तव में ‘विश्वकर्मा’ कोई जाति विशेष मात्र नहीं, बल्कि विपुल विश्व के कल्याण हेतु सतत क्रियमाण उस सर्जनात्मक चैतन्य शक्ति का नाम है, जो सम्पूर्ण सृष्टि में प्रकृति तथा प्राणि जगत् के अन्तःकरण में सदैव से विद्यमान उसे कर्म के लिए उद्बुद्ध करती है, अर्थात् भीतर से बाहर तक परिप्लावित एक ऐसी शक्ति, जिसकी प्रेरक दृष्टि से ही यह सृष्टि गतिशील होकर ‘जगत्’ अथवा ‘संसृति’ के रूप में सार्थकता पाती है। जहाँ, जिसमें जिस कारण से यह कल्याणमयी सर्जनात्मकता की प्रवृत्ति दिखायी देती है, उस प्रेरणा का नाम भी ‘विश्वकर्मा’ है। हम चाहें तो भगवान विश्वकर्मा के माहात्म्य को समझने के लिए पहले ‘विश्वकर्मा’ शब्द का तात्पर्य समझ लें, मिथकीय आख्यानों में देवताओं को उपकृत करने वाले महान विश्वकर्मा की महत्ता स्वीकार करें। सभ्यता के विकास के साथ सामाजिक वर्ण-व्यवस्था में विश्वकर्मा-वंशीय पेशे से परम्परागत रूप से जुड़े लोगों को हीनतर स्थिति में कैसे और क्यों धकेला गया होगा, इस पर चिन्तन करें और वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करते हुए उसके बेहतर भविष्य की संकल्पना भी प्रस्तुत करें। किसी शब्दकोश में ‘विश्वकर्मन्’ तथा ‘विश्वकृत’ शब्द भी देवताओं के शिल्पी, सृष्टि के रचयिता तथा सूर्य के अर्थ में प्रयुक्त है। संस्कृत के अन्य कोश में ‘विश्वकर्मा’ सूर्य के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। कहीं ‘विश्वकर्मा’ या ‘विश्वकर्मन्’ का पर्याय(समानार्थी) है देवशिल्पी, सूर्य, सूर्य की सात रश्मियों में से एक, संत, महात्मा, परमेश्वर, शिव, राज, बढ़ई, लुहार, चेतना नामक धातु। इसी शब्दकोश में अन्यत्र ‘विश्वकृत’ का अर्थ विश्वकर्मा, सृष्टिकर्ता भी दिया गया है, तो कहीं ‘विश्वकर्मा’ के सार्थक और आपत्तिजनक, दोनों पर्याय प्रस्तुत किये गये है, जैसे-अमर, आविष्कर्ता, कारु, तक्षक, तक्षा, त्वष्टा, देवशिल्पी, प्रजापति, प्रजेश, प्रजेश्वर, भौमन (यह वास्तव में ‘भौवन’ शब्द हो सकता है।), रूपपति, विधाता,, वृषकर्मा, शिल्पज्ञ, शिल्पिक, शिल्पी, सुकर्मा, सुधन्वा, सुरशिल्पी, स्थपति आदि) के अलावा इन्द्रद्रोही भी दिया गया है। विश्वकर्मा की जो मान्यता आधुनिक भारतीय समाज में विद्यमान है, वह ब्राह्मण ग्रन्थों, गृह्य सूत्रों और अनेक पुराणों में निबद्ध है। इस मान्यता की नींव वस्तुतः ऋग्वैदिक काल में पड़ चुकी थी। वैदिक देवताओं में विश्वकर्मा को श्रेष्ठ स्थान मिला हुआ है–विश्कर्मा विश्वेदेवा महा असि(ऋग्वेद-8/92-2)। वहाँ विश्वकर्मा सर्वद्रष्टा, सर्वस्रष्टा और सर्वज्ञाता है। प्रलय के उपरान्त यह संसार उसमें ही लीन हो जाता है। महीधर ने यजुर्वेद का भाष्य करते हुए लिखा है–जो विश्वकर्मा इन सब प्राणियों को प्रलय काल में अपने अन्दर समेटकर स्वयं चैन से बैठ जाता है, अतीन्द्रिय ज्ञानी, सृष्टि-यज्ञ का होता वह प्रभु हमारा पिता है। उक्त ऋग्वेद के दसवें मण्डल के 81वें सूक्त के देवता विश्वकर्मा, छन्द त्रिष्टुप है तथा ऋषि विश्वकर्मा भौवन हैं। अर्थात् देवता भुवन-सृजेता परमात्मा तथा उसके द्रष्टा ऋषि हैं भुवन में उत्पन्न वंशावतंस सृजेता ‘भौवन’(‘भुवन’ अथवा ‘भुवना’ से ही तज्जनित भाव में बना शब्द ‘भौवन’)। यह सूक्त सृष्टि-सृजन और विलय की प्रक्रिया से सम्बद्ध माना गया है। इसी अर्थ में आचार्य श्रीराम शर्मा ने इसकी पहली ही ऋचा में निहित विचार की ओर संकेत किया है कि सृजन के क्रम में परमात्म चेतना विश्वकर्मा का रूप धारण कर लेती है। वही पोषण के लिए पूषा बन जाती है। उत्पत्ति-विलय दोनों क्रम चलते रहते हैं। पहले वालों को संव्याप्त करते हुए अथवा आहुतियाँ देकर विलय करते हुए दिव्य चेतना नवीन लोकों में प्रवृत्त रहती है। उक्त सूक्त की पाँचवीं ऋचा में यह भाव ध्वनित होता है कि विश्वकर्ता परमात्मा सब भुवनों के सब प्राणियों के पोषण हेतु स्वयं ही महान प्रकृति यज्ञ चक्र का सम्पादन करते हैं। महीधर ने द्वितीय ऋचा के भाष्य में विश्वरूप को परिभाषित किया है कि वह अकेला महादेव एकमात्र सर्वेश्वर ही द्यु-भूमि रूप ब्रह्माण्ड का निर्माण करके अपने हाथों से पतनशील या अनित्य पंचभूतों से प्राणियों को मिलाकर गतिशील कर देता है। उसके सब ओर नेत्र हैं। उसके सब ओर मुख हैं, उसकी सब ओर भुजाएँ हैं और उसके सब ओर पैर हैं। अर्थात् क्योंकि वह सर्वेश्वर सब प्राणी रूप है। अतः उन-उन प्राणियों के नेत्र-मुख आदि उन्हीं के हैं, ऐसा समझना चाहिए(यजुर्वेद, महीधर-17/29)। पाँचवी ऋचा के द्वारा देवों के शिल्पी भौवन नामक विश्वकर्मा जगत् के कारण विश्वकर्म देव की स्तुति करते हैं-हे विश्वकर्म देव! जो तुम्हारे उत्तम शरीर हैं, जो तुम्हारे मध्यम शरीर हैं और जो तुम्हारे अधम शरीर हैं, उन सब शरीरों को हमें यज्ञ करने के लिए मेरे हव्यभूत होने पर दो। हे हव्यान्नयुक्त! तुम स्वयं ही अपने पूर्वोक्त तीनों प्रकार के शरीरों के द्वारा उत्तम देवादि शरीरों को, मध्यम मनुष्यादि शरीरों को और अधम कृमि-कीटादि शरीरों को तुमने ग्रहण किया है। अधिक क्या कहें, इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति होती है। उक्त भेद से अंगविहीन परमेश्वर का रूप न होने से उस सत् ने ईक्षण या दर्शन किया, मैं बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकार से उत्पन्न होऊँ, इत्यादि छान्दोग्य उपनिषद् की श्रुतियों(तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत। तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत। तस्माद्यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते-छान्दोग्य-6/2/3, पृष्ठ-538) से परमेश्वर का ही देवादि भेद से बहुत होना ज्ञात होता है। इस प्रकार विश्वकर्मा और विश्वकर्म को परिभाषित करने का इन ऋचाओं में प्रयास हुआ है। यह आगे के सूक्त में भी स्पष्ट होता है, जिसमें सृष्टि के लिए सर्वप्रथम जल को उत्पन्न करने का सन्दर्भ है। यह जीवन की परम आवश्यकता है। इसलिए कहा गया है कि शरीर और तेज को उत्पन्न करने वाले, अद्वितीय और साहस के धनी विश्वकर्मा ने पहले जल को उत्पन्न किया। यह मान्यता तैत्तिरीय संहिता में भी आयी है-आपो वा इदमग्रे(तैत्तिरीय-7/1/5/1)। मनु ने भी कहा है-अप एव ससर्जादौ(मनुस्मृति-1/8) श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी इसी आशय के मन्त्र मिलते है, मिला लीजिए-
सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।।
अर्थात् उन परमात्मा के हाथ, पैर, आँखें, सिर, मुख और कान सब जगह हैं। वे सब जगह, सब शक्तियों से सब कार्य करने में समर्थ हैं। उन्होंने सभी जगह अपने भक्तों की रक्षा करने तथा उन्हें अपनी ओर खींचने के लिए हाथ बढ़ा रखा है। उनका भक्त उन्हें जहाँ चाहता है, वहीं उन्हें पहुँचा हुआ पाता है। वे सब जगह सब जीवों द्वारा किये जाने वाले कर्मों को देख रहे हैं। उनका भक्त जहाँ उन्हें प्रणाम करता है, सर्वत्र व्याप्त होने के कारण उनके चरण और सिर आदि अंग वहीं मौजूद रहते हैं। अपने भक्त की प्रार्थना सुनने के लिए उनके कान सर्वत्र हैं(निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित घनानन्द का भक्त मन कहता है-‘कृपा-कान मधि नैन ज्यों त्यों पुकार मधि मौन’) और अपने भक्त द्वारा अर्पण की हुई वस्तु का भोग लगाने के लिए उनका मुख भी सर्वत्र विद्यमान है। वे परमेश्वर इस ब्रह्माण्ड में सबको सब ओर से घेरकर स्थित हैं–इस बात पर विश्वास करके मनुष्य को उनकी सेवा में लग जाना चाहिए। यह मंत्र गीता में भी इसी रूप में आया है। वह परमात्मा विश्वकर्मा सर्वव्यापी, सर्वभूतान्तरात्मा, विश्वरूप और विश्वकर्ता भी है। यह बात बारम्बार दुहरायी गयी है-
स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद् यः।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः सँ ्सारमोक्षस्थितिबन्धहेतु।।
अर्थात् वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा विश्वकृत् (सर्वस्रष्टा), विश्ववित् (सर्वज्ञ), आत्मयोनि(स्वयं ही अपने प्राकट्य का हेतु), काल का भी काल, महाकाल, सम्पूर्ण दिव्यगुणों से सम्पन्न, प्रधानक्षेत्रज्ञपति (प्रकृति और जीवात्मा का स्वामी), गुणेश (समस्त गुणों का शासक) तथा संसार-मोक्ष-स्थिति-बन्धहेतु (मृत्युरूप संसार में बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करने वाला है।गोस्वामी तुलसीदास ने परमब्रह्म स्वरूप राम की आद्या शक्ति जगज्जननी जानकी को ‘उद्भवस्थितिसंहारकारिणी’ कहकर यही संकेत किया है कि वह मूल शक्ति तो एक ही है, जो अनेक रूपों में व्यक्त होती है।
क्रमशः ..














