- डॉ. अमलदार ‘नीहार’
अवकाशप्राप्त प्रोफेसर – हिन्दी विभाग, श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलिया (उत्तर प्रदेश)
वेदों को यदि ‘श्रुति’ कहा गया, तो अभिप्राय यही कि ज्ञान का मौखिक सम्प्रदान शुरू हुआ, शायद उसे लिपिबद्ध करने की समुचित व्यवस्था न हुई हो। अर्थात् सुनने-समझने तथा समझाने की क्षमता विकसित होने पर ही वेदों की मौखिक या क्रमशः लिपिबद्ध रचना की गयी होगी। वेदों के अनन्तर या उसके साथ-साथ अन्य अनेक रचनाएँ लगातार रची गयी होंगी, जिनमें से लेखन-सामग्री की भंगुरता के कारण बहुत कुछ नष्ट भी हो गया होगा। अब एक के हाथ में लेखनी थी, जो नियम बनाता था, एक के हाथ में आयुध था, जो सैन्यबल से राज्य छीन लेता था, फसलों को नष्ट कर देता था, लोगों की हत्या कर देता था। पहले यह संघर्ष पशुओं के साथ था, अब आपस का संघर्ष बन गया। सामाजिक जीवन में अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी मेधा का उपयोग करने वाले मूल्यहीन होने लगे। क़लम ने तलवार के ऊपर भी शासन किया और अन्य लोगों को अनुशासित रखने के लिए तथा अपने सुख-भोग की निर्विघ्नता के लिए कड़े नियम बनाये। सुन्दर महल बनाने वालों के हाथ काट दिये गये। शिल्प और कला, प्रतिभा और कारीगरी के प्राण संकट में फँस गये। कल्पना की अतल गहराइयों में डूबकर मूर्तिकार ने बेडौल पाषाण को सजीव किया, भव्य मन्दिरों का निर्माण किया। उसे वस्त्र-भूषणादि से अलंकृत किया। उसने अजन्ता और एलोरा की गुफाओं में अपनी कला को जीवन्त रूप दिया। उसकी रचना ने स्वर्ग को धरती पर उतार दिया। उसने मन्दिर की रचना के साथ उसमें भगवान को ला बिठाया, उस भगवान को वस्त्राभूषण से अलंकृत भी उसी ने किया, किन्तु उसका प्रसाद उसे क्या मिला? अपनी रचना को देखकर वह रीझता रहा और उसके देखते-देखते उसका बनाया देवालय दुकान का रूप लेता गया-भोग और ऐश्वर्य का अड्डा बनता गया। शारीरिक श्रम से अपने आप को मुक्त रखने वाले दीन पुजारी भक्ति की दीवार के पीछे कब भोग और ऐश्वर्य के स्वामी बन बैठे, उसे पता ही न चला। मानवता की स्थापना को ध्यान में रखकर सबके हृदय में भक्ति की गंगा प्रवाहित करने के लिए ही उसने इतना बड़ा आयोजन किया था, किन्तु जब मन्दिरों में शूद्रादि का प्रवेश वर्जित कर दिया गया तो उसे अपनी भूल का पता चला।
मुझे तो यह ठीक समझ में आता है कि सभ्यता के विकास के साथ जब गाँव तथा नगर बसाये गये होंगे और लिपियों का विकास यहाँ तक पहुँचा होगा कि श्रुति-परम्परा में संचित ज्ञान को आरम्भिक उपलब्ध धातु अथवा भोजपत्र आदि पर लिपिबद्ध करने का हुनर मानव जाति ने सीख लिया होगा और वे कबीलाई संस्कृति से कुछ आगे बढ़कर शासन की शक्तिमत्ता प्राप्त कर चुके होंगे, तब उन्हें लिखित न्याय-विधान तथा नियामक शास्त्रों की आवश्यकता महसूस हुई होगी और उपकृत राजन्य वर्ग अथवा पुरोहितों ने और गुरुकुल चलाने वाले राजा के भी पूज्य आचार्यों ने उनके वर्चस्व की अक्षुण्णता बनाये रखने के उद्देश से आस्था, भक्ति तथा विश्वास पैदा करने वाली प्रकृति को संचालित करने वाली देवशक्तियों की कल्पना की होगी, मिथकीय आख्यान गढ़े गये होंगे और पेशे के अनुसार वर्ण-व्यवस्था की मुकम्मल व्यवस्था करके समाज को वर्गीकृत किया गया होगा। आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि तब वैज्ञानिक अनुसन्धान करने वाले अपनी श्रेष्ठता के कारण ब्राह्मण समझे जाते थे, बाद में काल-प्रवाह में अपने निर्धारित कर्म से च्युत होने के बावजूद जब वर्चस्वप्राप्त लोगों में प्रतिष्ठा की भूख पैदा हुई होगी तो आभिजात्य को जन्मजात मानकर कारीगर तथा श्रमजीवी वर्ग को हेय समझकर अनेक जातियों में विभाजित करते हुए भेदभाव का व्यवहार शुरू हुआ होगा, पर कहानियों में विश्वकर्मा का बनाया उड़नखटोला ही आज विमान बनकर आकाश की छाती पर फर्राटे भर रहा है। उनके वंशजों के बनाये मुरादाबादी बर्तन, लोहे की बनी छोटी-बड़ी मशीनें, घरेलू उपयोग की चीज़ें तथा काठ के कीमती फर्नीचर, उनके रजत-सुवर्ण के आभूषण, कीमती हीरे, जवाहरात तथा अनेक रत्न विश्व के बाजार में आकर्षण की वस्तुएँ हैं(आज लाभ की दृष्टि से तमाम सारी जातियों ने विभिन्न विश्वकर्मावंशी पेशों को अपना लिया है। इस प्रकार विश्वकर्मा की कला-कारीगरी के क्षेत्र में कितने लोग साझीदार हो चुके हैं, यह बताना मुश्किल हो गया है।
आज यह ज़रूरी नहीं कि जूते की दुकान खोलने वाला पुराने ज़माने का अछूत ही हो, बड़ी-बड़ी लांड्री खोलने वाले, होटल चलाने वाले या सोने-चाँदी का व्यापार करने वाले अथवा लोहे-लकड़ी का कारोबार करने वाले किसी भी जाति के हो सकते हैं। लाभ-हानि की दृष्टि से देखा जाय तो वे सबके सब सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यापारी हैं-वणिक वर्ग)। कला-कारीगरी से जुड़ा कोई भी व्यक्ति एक प्रकार से ‘विश्वकर्मा-चेतना’ का ही प्रतिनिधित्व करता है। वह रेलगाड़ी का आविष्कारक है, अनेक आधुनिक यन्त्रों, मशीनों, कम्प्यूटर, हवाई जहाज तक का निर्माता है। वह सूई से लेकर परमाणु बम तक अनेक वस्तुओं का रचनाकार है। इसलिए यह विश्वकर्मा-चेतना की जाति पूरे विश्व में फैल चुकी है, इसका निर्माण-धर्म निभाने वाले उसी भगवान विश्वकर्मा के उपासक हैं और दूसरी तमाम सारी बातें भूल उनकी पूजा एक विशेष दिन को अवश्य करते हैं। छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े प्रतिष्ठानों, मिल-कारखानों में सब एकजुट हो इस देवता से निज कल्याण की प्रार्थना करते हैं। जिस प्रकार विद्या की देवी सरस्वती की उपासना साहित्य, संगीत और कला आदि का पुजारी कोई भी व्यक्ति ज्ञान और बुद्धि-प्राप्ति के लिए कर सकता है, उसी प्रकार विभिन्न क्षेत्रों में अभियन्त्रण से लेकर लौह, काष्ठ, धातु, रत्न और वास्तु सम्बन्धी किसी भी कारीगरी की साधना के लिए भगवान विश्वकर्मा की कृपा की आवश्यकता सभी को पड़ती है। वह लेखनी और काग़ज़ भी निर्मित करता है, सितार, वीणा के तार भी बना सकता है तो युद्ध लड़ने के लिए तलवार, बन्दूक, भयानक परमाणु बम भी। एक तरफ़ वह अन्न के अधिक उत्पादन के लिए कृषि-यन्त्र तैयार कर सकता है तो विज्ञान की प्रयोगशालाओं में जीवनोपयोगी अनेक वस्तुएँ निर्मित करता है। वह आज भले ही सूर्य और चन्द्रमा को छोटा न कर पाये, पर इन सबकी ख़बर रखने के लिए प्रकाश-किरणों की गति से भी तेज चलने वाले राकेट-यान तथा अनेक विस्मयकारी उपग्रह तैयार करने की अनुसन्धान-यात्रा पर है। इसलिए विश्वकर्मा-बुद्धि से ईजाद जीवनोपयोगी वस्तुओं के बिना जी पाना किसी भी मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है। सच यह है कि जिस किसी शक्ति ने इतनी सुन्दर दुनिया बनायी है, वह परम प्रभु परमात्मा सबसे बड़ा कारीगर है, विश्व का रचयिता है, विश्वकर्मा है। मेरी समझ से विश्वकर्मा समूची सृष्टि को छन्दबद्ध करने वाला महानतम कवि है–शक्ति, प्रेम, करुणा से भरा हुआ। वही हमारा सबका पिता और हम हैं उसके वंशज।
इस देश में जितना शिव को याद किया है सबने, उतना शायद विश्वकर्मा नाम के देवता को नहीं। भवन-निर्माण या भूमि-पूजन के समय भले ही क्षण भर के लिए किसी कर्मकाण्ड में याद किया जाता हो, पर इसे याद रखिए कि जो नींव में होता है, वह दिखायी नहीं देता। आज पूरे विश्व में जितने कल-कारखाने हैं, जितनी दुकानें हैं लोहा-लकड़ी की या किसी भी तकनीक की, कम्प्यूटर से लेकर साधारण से साधारण हुनर की आजीविका से जुड़े लोग औपचारिक रूप से विश्वकर्मा-पूजन करते हैं। चेतना-सम्पन्न लोग अपने घरों में भी करते हैं। सच पूजिए तो कर्म ही पूजा है तो जो कर्मशील हैं, वे सब दिन-रात, बारहों महीने विश्वकर्मा-पूजन ही किया करते हैं। ये नदियाँ, समुन्दर, ये पर्वत, ये जंगल, यह पवन, अग्नि, ये बादल, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करते हुए ये सभी ग्रहमण्डल उस अनन्त परमात्मा स्वरूप विश्वकर्मा की पूजा ही तो कर रहे हैं।
इस संसार के उद्भव में कार्य करने वाली शक्ति स्रष्टा अर्थात् विधाता ब्रह्मा नाम से प्रसिद्ध (विश्वकर्मा)है, सम्पूर्ण सृष्टि के पोषण में सहायक सर्वव्यापक विष्णुनाम धारी भी (विश्वकर्मा) है और इस चराचर जगत् में सन्तुलन नष्ट हो जाने पर नवनिर्माण हेतु जीर्ण-शीर्ण का ध्वंस करने वाली शक्ति के रूप में ख्यात शंकर भी(विश्वकर्मा) है। लोग अपनी-अपनी मति, आस्था, श्रद्धा के अनुसार बाह्याचरण से या अन्तर्मन से विश्वकर्मा की ही उपासना किया करते हैं। हमारे शब्दकोशों में ब्रह्मा को भी विश्वकर्मा कहा गया है, अर्थात् वह विश्वनिर्माण का काम करता हुआ विश्वकर्मा उपाधि का सार्थक करता है। प्रत्येक प्राणी में सृष्टि-निर्माण की जो भावना उद्भूत है, वह उस परम शक्ति विश्वकर्मा की ही प्रेरणा से है। जिस सृजन में कल्याण का भाव है, वह विश्वकर्मा का ही कार्य है। किसी पेड़ पर नीड़ के निर्माण में जुटी गौरैया हो, शहद का निर्माण करने वाली मधुमक्खी हों, अनवरत कर्मरत अखण्ड प्रेरणा-स्रोत ये हमारी प्यारी चींटियाँ या विशाल भवन, अट्टालिका, मन्दिर, पाठशाला, कार्यशाला, विश्वविद्यालय, चिकित्सालय, प्रासाद का निर्माण करने वाले स्थपति हों या झोपड़ी बनाने वाले, किसी वस्तु का निर्माण करने वाले कारीगर वस्तुतः ये सभी विश्वकर्मा-भाव के साथ निर्माण में हाथ बँटाते हैं। इसी प्रकार जो सृष्टि को गतिमान बनाये रखने में सहायक होता है, पोषण तथा विकास करने की भूमिका में हो, वह भी विश्वकर्मा है, जिन शक्तियों से अमंगलकारी तमस्तत्व का विनाश होता चलता है, वह भी विश्वकर्मा के कार्य करता है, यह सूरज, यह सम्पूर्ण प्रकृति विश्वकर्मा के ही कार्य कर रही है। इस शब्द को या इस दिव्य शक्ति को सीमित-संकुचित दायरे में नहीं देखा जा सकता है। त्रिगुणात्मिका यह प्रकृति अथवा स्त्री सदैव सर्वकाल में सृजन-उद्भव तथा विनाश कार्य में लगी रहती है, विश्वकर्मा की भूमिका का निर्वहन करती है।
यदि कोई कवि अपनी सर्जना से मनुष्यता के बीज बोता है, उसका पल्लवन करता है, जागरण के मंत्र फूँकता है, असत्, अन्याय, शोषण के विरुद्ध उठ खड़े होने की प्रेरणा-शक्ति से स्फूर्त करता है, मन में ओज और तेज भरता है और प्राणों में जड़ता रूपी तमस् को छिन्नमूल करने के लिए ऊर्जा का संचार करता है तो वह वास्तव में विश्वकर्मा के कार्य करता है। शिवभक्त पुष्पदन्ताचार्य ने भगवान शिव की अभ्यर्थना में सृजन-पोषण तथा संहार करने वाले जिस त्रिगुणमय परमात्मा हेतु मंगल-मंत्र प्रस्तुत किया है, उससे महाशक्ति विराट विश्वकर्मा की स्तुति के स्वर प्रस्फुटित होते हैं–
बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमोनमः
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमोनमः।
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमोनमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमोनमः।।
अर्थात् विश्व की सृष्टि के लिए रजोगुण की अधिकता धारण करने वाले ब्रह्मारूपधारी आपको बारम्बार नमस्कार है। विश्व के संहार के लिए तमोगुण की अधिकता धारण करने वाले हर(रुद्र)-रूपधारी आपको बारम्बार नमस्कार है। समस्त जीवों के सुख(पालन) के लिए सत्त्वगुण की अधिकता धारण करने वाले विष्णुरूपधारी आपको बारम्बार नमस्कार है। स्वयंप्रकाश मोक्ष के लिए त्रिगुणातीत, समस्त द्वैत से रहित मंगलमय अद्वैत(आप) शिव को बार-बार नमस्कार है।
अब आप सद्योजात, ईशान, तत्पुरुष, वामदेव और अघोरमुख नामक मुखां को ही धारण करने वाले भगवान विश्वकर्मा के सभी गुणों का ध्यान करिए। वे न केवल सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं, अपितु देवों की उत्पत्ति के साथ उनके लिए उनके लोकों का निर्माण करते हैं, उनके लिए भव्य भवनों वाले नगर की रचना करते हुए उनके सुख-साज के सभी साधन प्रदान करते हैं, उन सबको शक्तिशाली बनाने के लिए उन्हें अलौकिक आयधों से सुसज्जित करते हैं, जिससे वे उभरते तमस्तत्त्व का उन्मूलन कर सकें। यही नहीं, अन्यान्य सभी लोकों में वे ऐसी ही व्यवस्था करते हैं, पाँच महावैज्ञानिक अपने पुत्रों के माध्यम से विश्व-निर्माण हेतु उन्हें उनका दायित्व सौंप देते हैं। मोटे तौर पर भवन-निर्माण में लगे लोगों से लेकर लौहकर्मी, काष्ठकार, शिल्पी मूर्तिकार आदि का यह त्योहार माना जाता है, पर कला-कारीगरी से जुड़े सोने-चाँदी के आभूषण-निर्माता तथा बर्तन बनाने वाले ठठेर और दूसरे लोग भी पेशे के रूप में जो कार्यरत हैं, विश्वकर्मा का ही दायित्व-निर्वहन कर रहे हैं, किन्तु विश्वकर्मा-तत्त्व का प्रसार यहीं तक सीमित नहीं है, सूई से लेकर हवाई जहाज के निर्माण तक उनका ही कार्य-विस्तार है।
आज के दौर में बड़ी पूँजी वाले जो इस धंधे को अपनाये हुए हैं, वे तो मुनाफ़ा कमाने में लगे हुए हैं, किन्तु अपनी कारीगरी की कमाई खाने वाले इस हुनर से जुए हुए लोग मात्र मजदूर बनकर रह गए हैं। मैंने कई विभागों में देखा है कि छोटे पद पर काम करने वाला कोई कर्मचारी उसी विभाग के डिग्रीधारी इंजीनियर से अधिक ज्ञान रखता है, किन्तु कम पढ़ा-लिखा होने के कारण निम्नतम मजदूरी पर कार्य करने को अभिशप्त है। वस्तुतः विश्व का असली श्रमिक दिवस यही है। अपनी कला तथा तकनीकी ज्ञान से विश्व-निर्माण में लगे लाखों और करोड़ों की संख्या में यह वर्ग पसीना बहाने के बावजूद तमाम सुविधाओं से वंचित-उत्पीड़ित है-वह अपनी तमाम काबलियत के बावजूद बड़े सपने नहीं देख सकता। सामाजिक, आर्थिक तथा बौद्धिक दरिद्रता के दलदल में धँसे लोगों की दशा चिन्तनीय है।
यदि देव पक्ष में वह विश्वकर्मा रूप में विद्यमान है तो वही असुर पक्ष में मयासुर नाम से ख्यात है। भगवान शिव में भी यही गुण हैं कि वह अजातशत्रु है, सबका कल्याण करने वाला। कश्यप ऋषि की ही दो पत्नियों–दिति तथा अदिति से संजात दैत्य और देवता आपस में जो संघर्ष करते चले आ रहे हैं, वह दो भाइयों का संघर्ष है, वह आज भी हमारे आपके घरों में देखा जा सकता है, लेकिन जो पिता की भूमिका में रहता है, परिवार का मुखिया होता है, वह दोनों कुलात्मजों से प्यार करता है। यह जो निरन्तर सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय, शोषण और पोषण भाव की लड़ाई चल रही है, यही देव-दानव का संघर्ष है, यही अन्धकार से उजाले की लड़ाई है। महाशिव दोनों को शक्ति देता है, पर आशीर्वाद प्रकाश तत्व को ही प्रदान करता है। अन्धकार जब भारी पड़ने लगता है तो वह स्वयं प्रकाश का प्रतिनिधित्व करता है। यह जो देवाधिदेव महादेव शिव है, विष्णु की तरह पक्षपात नहीं करता, ब्रह्मा की तरह विकारग्रस्त नहीं होता, बल्कि न्याय करता है, इसीलिए वह सर्वपूज्य है।
विश्वकर्मा भी महाशिव है, सभी प्राणियों की निर्माण-चेतना में रमा हुआ सबका कल्याण-कर्त्ता। दुर्भाग्यपूर्ण दरिद्रता के दलदल में धँसे पिछड़े और शोषित समाज की चेतना को स्फूर्त करने के लिए पुनः ऋषि भौवन विश्वकर्मा के तेजस्वी मंत्रों की आवश्यकता है और पूरी दुनिया की पीड़ा-भरी पुकार के सेनानी सत्य-द्रष्टा मंगल-स्रष्टा कवि के शब्दों में परमात्म-स्वरूप विश्वकर्मा के लिए पवित्र आवाहन-मंत्र सुनिए और जगाइये हृदय-विपंची के सोये हुए तार-‘जागो फिर एक बार’–
हरि-हर-विधि की शक्ति से आपूरित ‘नीहार’
करे जगत-निर्माण नित् विश्व-सुमंगल-कार्य।
विश्वकार भगवान का अंश-रूप अवधार्य।।
विश्वकृती स्रष्टा जगत् पोषक विष्णु विराट
लयकारी आनन्द-विभु शर्व शक्ति-सम्राट।।
वही महाशिव-पंचमुख, वही कार्य, अभिधान।
करे सदा निर्माण नव, बोध शोध-संधान।।
ज्ञान-कला-विज्ञानव्रत, निरत सतत उपकार।
विश्व-सुकर्मा-वंश हम अंश-बीज-अवतार।।
मनु-मय-त्वष्टा-कुल कहो शिल्पी औ दैवज्ञ।
ज्ञानेन्द्रिय लख पाँच, वपु महाभूत में प्रज्ञ।।
मिथक-कथाओं में निहित विहित ज्ञान-सन्देश।
प्रतीकार्थ समझे सुबुध कुल-समाज औ देश।।
भीतर से हम एक ही, हैं बाहर से भिन्न।
भेद-भाव उपजे विकट, छल-दुराव से खिन्न।।
जो कुछ श्रेयस् विश्व में ज्ञान और विज्ञान।
वही एक है मूल में, हरे सकल अज्ञान।।
जाति-वर्ण-कुल-धर्म-मत छिलके, गूदा एक।
‘एक रसो वै सः’ रमे अणु-अणु व्याप्त विवेक।।
दृश्य सकल ब्रह्माण्ड यह–पृथ्वी, नभ, शशि, सूर्य।
अनल-अनिल-जल, तूर्ण ध्वनि पूर्यमाण दिक् तूर्य।।
जिसकी इच्छा से जगत्, जीवन का विस्तार।
है सबमें वह राजता, करे सभी से प्यार।।
जिसमें रचनाधर्मिता, मानवता का सार।
हरि-हर-विधि की शक्ति से आपूरित ‘नीहार’।।












