भारतीय संस्कृति में महाशक्ति विश्वकर्मा : मिथक और यथार्थ खण्ड : दो

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अमलदार ‘नीहार’
  • डॉ. अमलदार ‘नीहार’
    अवकाशप्राप्त प्रोफेसर – बलिया (उत्तर प्रदेश)

रामकृष्ण परमहंस ने जो दरिद्र में नारायण की कल्पना करते हुए अपने शिष्य विवेकानन्द को मानवता की सेवा की प्रेरणा दी थी, उसका जीवन पर्यन्त पालन किया स्वामी विवेकानन्द ने और रामकृष्ण मिशन चिकित्सालयों की स्थापना पूरे देश में करायी, वही मंत्र अपनाया महामना मदन मोहन मालवीय ने और महात्मा गाँधी ने भी अपने जीवन में उसी मंत्र का पालन किया। इन सभी महापुरुषों के लिए राष्ट्र की सेवा और मानवता की सेवा, दो अलग चीजें न थीं। ध्यान देने की बात यह है कि श्वेताश्वतरोपनिषद् के जिस अध्याय में परमात्मा को सर्वव्यापी और दिङ्मण्डल में विस्तीर्ण हाथ, पैर, सिर तथा मुख वाला बताया गया है, उसी के क्रम में चतुर्थ अध्याय में उसी जगद्व्याप्त जगन्नियन्ता और स्रष्टा को ‘विश्वकर्मा’ उपाधि भी दी गयी है, यह अनायास नहीं है; उसके विशेषणों पर भी ध्यान रखिए-

एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः।
हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति।।

ये जगत् को उत्पन्न करने वाले महात्मा अर्थात् सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी परमदेव परमेश्वर सदा ही सभी मनुष्यों के हृदम में सम्यक् प्रकार से स्थित हैं। उनके गुण-प्रभाव को सुनकर द्रवित और विशुद्ध हुए निर्मल हृदय से, निश्चय-युक्त बुद्धि से तथा एकाग्र मन के द्वारा निरन्तर ध्यान धरने पर वे परमात्मा प्रत्यक्ष होते हैं। जो साधक इस रहस्य को जान लेते हैं, वे उन्हें प्राप्त करके अमृतस्वरूप हो जाते हैं, सदा के लिए जन्म-मरण से छूट जाते हैं।

विश्वकर्मा के रूप में सर्वशक्तिमान् परमात्मा की सर्वव्याप्ति, सहृदयता तथा उदारता का बखान करते हुए मंत्रद्रष्टा उसे अगले मंत्र-श्लोक में सभी देवताओं का उपास्य एकमात्र कल्याणकारी शिव बताता है। कोई यह मान सकता है कि औपनिषदिक मन्त्रों में ‘विश्वकर्मा’, ‘शिव’, ‘स्रष्टा’ आदि शब्द एक ही परम ब्रह्म सर्वोच्च शक्तिमान् के वैशिष्ट्य-व्यंजक शब्द हो सकते हैं, अन्यान्य शिषेषण भी वहाँ मौजूद हैं; क्योंकि भगवान विश्वकर्मा का जो स्वरूप वेद-पुराणों में वर्णित है, वह औपनिषदिक मंत्रगत विवृत्ति से बिल्कुल भिन्न और सगुणात्मक है। हाँ, उस परमात्मा के निर्गुण तथा सगुण, दोनों रूपों का स्वीकार अवश्य है, जिसके आधार पर उसके आविर्भाव की कल्पना किसी की सन्तान के रूप में आगे चलकर विभिन्न पुराण-ग्रन्थों में अनेक रूपों में की गयी है, इसके बावज़ूद बड़ी आसानी से यह सिद्ध किया जा सकता है कि विश्वकर्मा न तो सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा से भिन्न हैं, न विराट विष्णु से और न ही महाशिव से, बल्कि वह तीनों का पर्याय है, इन तीनों का समाहार है। शब्दकोश भी तो यही बताते हैं। कभी कहीं विश्वकर्मा को ब्रह्मा का या त्वष्टा(त्वष्टा का अर्थ ब्रह्मा होता है, विश्वकर्मा के तीसरे पुत्र का भी यही नाम है। हिन्दी बृहत् कोश, पृष्ठ-498 पर त्वष्टा का अर्थ देवशिल्पी, विश्वकर्मा, ग्यारहवें आदित्य, एक वैदिक देवता जो पशुओं और मनुष्यों कें शरीर का निर्माण करते हैं, बढ़ई दिया गया है। इसी पृष्ठ पर त्वाष्ट्री का अर्थ विश्वकर्मा की बेटी संज्ञा उल्लिखित है।) का पुत्र कहा गया तो दूसरी जगह आंगिरस बृहस्पति की भगिनी योगसक्ता या योगसिद्धा भुवना तथा दक्षपुत्र आठ वसुओं में से एक विभावसु या प्रभास(दोनों अर्थ की दृष्टि से एक ही हैं) के संयोग से उत्पन्न। आंगिरसी ब्रह्मवादिनी भुवना से उत्पन्न होने के कारण वे ‘भौवन’ कहलाये तो ब्रह्मा की सृष्टि को शक्ति-सम्पन्न बनाने तथा उसे सुन्दर नगरों-भवनों से सजाने, देवताओं को दिव्य आयुधों से शक्तिमान् बनाने तथा देवलोक और मृत्युलोक में जीवन के लिए आवश्यक सभी उपकरणों के निर्माण में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सर्वसमर्थ महाशक्तिपुंज। ऋग्वेद में ऋषि का नाम भी भौवन विश्वकर्मा है और वे आदि शक्ति विश्वकर्मा से सम्बन्धित ऋचाओं की रचना करते हैं, अभिप्राय यह कि वे विश्वकर्मावंशी ब्राह्मण ऋषि हैं, इसलिए नाम में अभिन्नता हो गयी है। मुझे तो यही सही लगता है कि विश्वकर्मा नामक एक ही महाशक्ति त्रिदेव रूपों में एक साथ तीनों दायित्व निभा रही है या इन सृजन-पोषण और संहार करने वाली इन तीन महाशक्तियों के माध्यम से वही एक परमब्रह्म सारे कार्य सम्पादित करने की प्रेरणा दे रहा है।

वैसे तो ऋक्, यजु, साम तथा अथर्व आदि चारों वेदों से लेकर मनुस्मृति, सूर्यसिद्धान्त, स्कन्दपुराण, मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, वराहपुराण, पद्मपुराण, स्तम्भपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, श्वेताश्वतरोपनिषद्, ऐतरेय ब्राह्मण, निरुक्त, विष्णुरहस्य, देवीभागवत पुराण, वाल्मीकीय रामायण, अध्यात्म रामायण, महाभारत तथा श्रीमद्भागवत आदि महाग्रन्थों में भगवान विश्वकर्मा और उनके पुत्रों की गरिमापूर्ण गाथाएँ प्रकीर्णक रूप में मिलती हैं। वास्तु विज्ञान के 18 उपदेष्टाओं में विश्वकर्मा प्रमुख माने जाते हैं। वे हंसारूढ़ त्रिनेत्रधारी, श्वेतश्मश्रु तथा पंचमुख माने जाते हैं। श्री गणेश जी की पत्नियाँ ऋद्धि और सिद्धि भी विश्वकर्मा देव की ही पुत्रियाँ मानी जाती हैं। उल्लिखित ग्रंथों में विज्ञान-देवता विश्वकर्मा का जो वृत्तांत मिलता है, उसमें बड़ी विसंगतियाँ देखने को मिलती हैं, लेकिन प्रतीकों में आविष्ट निहितार्थ समझ में आ जाता है। कहीं पर उन्हें भगवान शंकर का अवतार या समानधर्मा कहा गया है, क्योंकि भगवान विश्वकर्मा भी पंचानन (पाँच मुखों वाले) माने गए हैं और उनके मुखों के नाम भी पंचानन महाशिव के समान हैं-1-सद्योजात, 2-वामदेव, 3-अघोर, 4-तत्पुरुष, 5-ईशान। अन्यत्र विश्व-निर्माण की दृष्टि से स्रष्टा का अर्थ ब्रह्मा भी होता है और विश्वकर्मा भी। शब्दकोश ‘विश्वकर्मा’ का अर्थ विश्वस्रष्टा परमात्मा, ईश्वर, ब्रह्मा और भगवान शंकर स्वीकार करें तो वह उचित ही है। रचनाधर्मिता की दृष्टि से विधाता और विश्वकर्मा एक ही हैं। अपने आयुध-निर्माण के ज्ञान के कारण वे प्रलयकारक शंकर भी हैं अथवा लोकमंगल की भावना के कारण वे ‘शिव’ भी हो सकते हैं। जैसे भूतभावन सदाशिव जगत् का कल्याण करने वाले हैं, विश्वकर्मा का स्वभाव भी वैसा ही है। अपनी स्थापत्य-कला से उन्होंने त्रिभुवन को सुन्दर, वैभव-संपन्न और सुखमय बनाया।

ऋग्वेद में विश्वकर्मा सूक्त नाम से 11 ऋचाएँ लिखी हुई हैं, जिनके प्रत्येक मंत्र पर ऋषि विश्वकर्मा भौवन देवता आदि लिखा है। यही सूक्त यजुर्वेद अध्याय 17 में मंत्र 16 से 31 तक 16 मंत्रों में आया है। विश्वकर्मा शब्द वहाँ एक बार इन्द्र व सूर्य का विशेषण भी बनकर आया है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में विश्वकर्मा देव के वंशजों की चर्चा है। विश्वकर्मा पंचमुख है तो पाँच पुत्र भी मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ। लोकहित के लिए अनेकानेक पदार्थ उत्पन्न करने वाले तथा घर, मन्दिर एवं भवन(प्रासाद), मूर्तियाँ आदि को बनाने वाले, अलंकारों की रचना करने वाले। इनकी सारी रचनाएँ लोकहितकारिणी है। इसलिए ये पाँचों वंदनीय शिल्पी हैं। प्रथम पुत्र मनु के कुल में अग्निगर्भ, सर्वतोमुख एवं ब्रह्म उत्पन्न हुए और मनु की पत्नी का नाम कांचना था। दूसरे पुत्र मय का विवाह सौम्या देवी से, तीसरे पुत्र त्वष्टा का विवाह कौशिक मुनि की पुत्री जयन्ती से, चौथे पुत्र शिल्पी का विवाह महर्षि भृगु की पुत्री करुणा से तथा पंचम पुत्र दैवज्ञ की भार्या बनी जैमिनी ऋषि की पुत्री चन्द्रिका देवी। मुझे तो यह पाँच की संख्या रहस्य और कौतूहल से भरी लगती है। विश्वकर्मा देव के पाँच मुख, फिर उनके पाँच पुत्र और पाँचों पाँच विभागों में विज्ञान-कौशल में प्रवीण। पंच महाभूत और उनसे सम्बन्धित विज्ञान, शरीर में पंच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और उनके पाँच विषय-रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पंच कर्म, कामदेव के पंच वाण, पंच यज्ञ, पाँच महाव्रत, पाँच ध्वनियाँ, पंचधातु, व्याकरण के पाँच स्तम्भ-सूत्र, वार्तिक, भाष्य, कोष और कवियों के प्रयोग आदि। ये सब विश्वकर्मा देव को समझने-समझाने के सूत्र हो सकते हैं।

विष्णुसहस्त्रनाम में विष्णु का एक नाम ‘विश्वकर्मा’ भी है। न केवल नाम है, बल्कि सभी विशेषताएँ भी वही हैं–

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः।।

‘विष्णुसहस्त्रनामस्तोत्र’ के इस 19 वें श्लोक में जो दूसरी पंक्ति है, उसके सभी नाम विश्वकर्मा के ही पर्याय लगते हैं। कहीं ऊपर की पंक्ति में आये शब्द ‘अप्रमेय’, ‘हृषीकेश’, ‘पद्मनाभ’ और ‘अमर प्रभु’, ये सब महान विश्वकर्मा के ही विशेषण रूप में तो नहीं आये हैं? आखि़र विश्वकर्मा के इतने नाम एक साथ रखने का दूसरा क्या औचित्य हो सकता है? यह विचार करने की चीज़ है। हमारे यहाँ महादुर्गा महाशक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं, वह शिव की शक्ति पार्वती से भी अभिन्न हैं, महाकाली से भी अभिन्न और उन्हें सभी देवता अपनी शक्तियों से सुसज्जित करते हैं; क्योंकि वे निर्जरांश, उनकी ही तेजस्-पुंजस्वरूपा हैं और उन्हें शक्तिशाली बनाने में योगदान है देवताओं के देवता वैज्ञानिक महाशक्तिशाली विश्वकर्मा का भी–

विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम्।।
अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम्।
अम्लानपंकजां मालां शिरस्युरसि चापराम्।।

विश्वकर्मा ने सभी देवताओं को बहुत कुछ दिया है तो महादुर्गा को भी अत्यन्त निर्मल फरसा भेंट किया। साथ ही अनेक प्रकार के अस्त्र और अभेद्य कवच दिये; इसके सिवा मस्तक और वक्षःस्थल पर धारण करने के लिए कभी न कुम्हलाने वाली कमलों की मालाएँ दीं।

आइये सगुण विश्वकर्मा के विषय में प्राप्त तथ्यों के आधार पर उसकी महाशक्तियों का विश्लेषण करते हुए आगे बढ़ते हैं कि क्या वह किसी सीमित दायरे में बँधा हुआ है, उस पर किसी का अंकुश अथवा अनुशासन भी है, क्या वह किसी की दया का पात्र है या उसके सम्मुख सारे देवता कमज़ोर और छोटे दिखायी देते हैं। अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए देववृन्द महाशक्तिशाली विश्वकर्मा की विज्ञानबुद्धि से परिचित किस प्रकार उनके सम्मुख हाथ जोड़े खड़े रहते थे। निर्विवाद रूप से पौराणिक विश्वकर्मा देव ने न केवल सभी देवताओं के लिए सुख के साधन जुटाये, बल्कि अलौकिक शस्त्रास्त्रों से उन्हें सुसज्ज्ति करके उन्हें अत्यन्त शक्तिशाली बना दिया। बदले में कृतघ्न देवराज ने उनके तथा उनकी सन्तति के साथ कैसा दुर्व्यवहार किया।

महाभारत ग्रन्थ में विश्वकर्मा के उद्भव के विषय में कुछ यों लिखा गया है–

बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मवादिनी।।
योगसक्ता जगत् कृत्स्नमसक्ता विचचार ह।
प्रभासस्य तु भार्या सा वसूनामष्टमस्य ह।।

बृहस्पति की बहिन स्त्रियों में श्रेष्ठ एवं ब्रह्मवादिनी थीं। वे योग में तत्पर हो सम्पूर्ण जगत् में अनासक्त भाव से विचरती थीं। वे ही वसुओं में आठवें वसु प्रभास(वेद, पुराण तथा महाभारत में उल्लिखित इन वसुओं के नामों में भिन्नता है) की धर्मपत्नी थीं।

विश्वकर्मा महाभागो जज्ञे शिल्पप्रजापतिः।
कर्ता शिल्पसहस्त्राणां त्रिदशानां च वर्धकिः।।

शिल्पकर्म के ब्रह्मा महाभाग विश्वकर्मा उन्हीं से उत्पन्न हुए हैं। वे सहस्त्रों शिल्पों के निर्माता तथा देवताओं के बढ़ई कहे जाते हैं–

भूषणां च सर्वेषां कर्ता शिल्पवतां वरः।
स दिव्यानि विमानानि त्रिदशानां चकार ह।।

वे सब प्रकार के भूषणों को बनाने वाले और शिल्पियों में श्रेष्ठ है। उन्होंने देवताओं के असंख्य दिव्य विमान बनाये हैं–

मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्पं महात्मनः।
पूजयन्ति च य नित्यं विश्वकर्माणमव्ययम्।।

मनुष्य भी महात्मा विश्वकर्मा के शिल्प का आश्रय ले जीवन-निर्वाह करते हैं और सदा उन अविनाशी विश्वकर्मा की पूजा करते रहते हैं।

आगे विश्वकर्मा की पुत्री ‘संज्ञा’ को त्वष्टा की पुत्री बताया गया है, जब कि अन्यत्र त्वष्टा विश्वकर्मा के तीसरे पुत्र हैं। महाभारत के अनुसार त्वष्टा की पुत्री संज्ञा भगवान सूर्य की धर्मपत्नी हैं। वे परम सौभाग्यशाली हैं। उन्होंने अश्विनी का रूप धारण करके अन्तरिक्ष में दोनों अश्विनीकुमारों को जन्म दिया–

त्वाष्ट्री तु सवितुर्भार्या वडवारूपधारिणी।असूयत महाभागा सान्तरिक्षेऽश्विनावुभौ।।

स्कन्द पुराण के अनुसार ब्रह्मा के नारद, मरीचि, धर्म, अत्रि तथा वशिष्ठ आदि पाँच पुत्रों में से धर्म के दो पुत्र हुए-प्रत्यूष वसु और प्रभास वसु(आठ वसुओं में ये दोनों परिगणित हैं)। इनमें प्रभास वसु का विवाह मरीचि ऋषि की पुत्री (अतिरूपा) और अंगिरा ऋषि से उत्पन्न योगसक्ता (ब्रह्मवादिनी) से हुआ। यही ब्रह्मवादिनी योगसक्ता देवगुरु वृहस्पति की भगिनी थीं। प्रभास और ब्रह्मवादिनी के संयोग से विश्वकर्मा का आविर्भाव हुआ। इस प्रकार विश्वकर्मा देवगुरु के भागिनेय हुए। प्रह्लाद की पुत्री और विरोचन की भगिनी प्रह्लादी से विश्वकर्मा का विवाह सम्पन्न हुआ। पुराणों में ऐसा आख्यान मिलता है कि विश्वकर्मा की बेटी का नाम संज्ञा था, जिसका विवाह उन्होंने सूर्य से किया। लोग योग्य वर के लिए अपनी कन्या को योग्य बनाने का प्रयास करते हैं, किन्तु पुराण जानता है कि भगवान विश्वकर्मा ने सूर्य को अपनी पुत्री संज्ञा के अनुकूल बनाने के लिए तेजहीन करके छोटा कर दिया। इन्हीं सूर्य-संज्ञा के सम्मिलन से तेजस्वी अश्विनीकुमारों का जन्म हुआ, जो देवताओं में वैद्य माने जाते हैं।

मार्कण्डेय पुराण में विश्वकर्मा की कथा में भी संज्ञा उनकी अपनी बेटी है, जिसका विवाह विवस्वान सूर्य से हुआ और सूर्य से सर्वप्रथम संज्ञा के गर्भ से यशस्वी वैवस्वत मनु का जन्म हुआ, दूसरा पुत्र प्रजाजनों को संयम में रखने वाला यम तथा तीसरी पुत्री यमुना उत्पन्न हुई। प्रजापतिकुमारी संज्ञा सूर्य के तेज से बहुत डरती थी, इसलिए उसने अपनी छाया को ही सूर्यदेव की पत्नी बनाया और स्वयं अपने पिता विश्वकर्मा देव के घर चली गयी। वह कुछ काल तक वहाँ रुकी, तदनन्तर पिता ने समझा-बुझाकर उसे अपने पति सूर्यदेव के घर जाने को कहा। संज्ञा ने पिता को बिल्कुल नहीं बताया कि वह सूर्यदेव से डरती है और फिर पिता के घर से पतिगृह न जाकर उत्तर कुरु प्रदेश में तप करने चली गयी और वहाँ वडवा(घोड़ी) के रूप में रहने लगी। उधर छायासंज्ञा को ही असली संज्ञा समझ भगवान सूर्य ने उससे दो पुत्र और एक मनोहर कन्या उत्पन्न की। अब धीरे-धीरे छाया संज्ञा ने बच्चों के साथ सौतेला व्यवहार शुरू कर दिया। दुर्व्यवहार जब सहन न हुआ तो संज्ञा-पुत्र यम उसे लात मारने को तैयार हो गये। इस पर रुष्ट छाया ने कुपित हो यम को शाप दे दिया कि ‘तुम्हारा पैर आज ही पृथ्वी पर गिर पड़ेगा। यमराज से माता के इस निर्मम व्यवहार की जानकारी मिली सूर्यदेव को और तब उन्होंने कड़ाई के साथ छाया से जब पूछताछ की, सारा भेद खुल गया। वे तुरन्त जब अपने श्वसुर विश्वकर्मा देव के घर गये तो वहाँ संज्ञा नहीं मिली और उनसे पहले का सब वृत्तान्त मालूम हुआ। ध्यान करने पर पता चल गया कि संज्ञा कहाँ किस रूप में निवास कर रही है। तब दामाद के निवेदन पर भगवान विश्वकर्मा ने सूर्य के संवत्सररूप चक्र वाले तेज के सोलह भागों में से पन्द्रह भाग छाँट दिये। भगवान सूर्य तब से अपने तेज के सोलहवें भाग को धारण करते हैं। सूर्य के इन्हीं छाँटे गये तेज के पन्द्रह भागों से महान वैज्ञानिक विश्वकर्मा देव ने शंकर जी का त्रिशूल, भगवान विष्णु का चक्र, वसुगणों के भयंकर शंकु, अग्नि की शक्ति, कुबेर की शिविका तथा अन्यान्य देवता, यक्ष एवं विद्याधरों के लिए भयंकर अस्त्र-शस्त्र बनाये। तब से सूर्य का रूप अधिक सुन्दर-सलोना हो गया। इसी क्षीण तेज के साथ सूर्यदेव संज्ञा के पास अश्वरूप में पहुँचे थे और आगे दो अश्विनीकुमारों का जन्म हुआ। इसी वडवा रूप से संज्ञा ने नासत्य, दस्र और रेवन्त नामक पुत्रों को जन्म दिया। फिर उसने अपने पूर्व रूप को धारण कर लिया। छायासंज्ञा ने भी सूर्यदेव से संज्ञा-पुत्र वैवस्वत मनु के समान ही तेजस्वी सावर्णिक नाम से प्रसिद्ध पुत्र प्राप्त किया, दूसरा पुत्र शनिश्चर नाम से जाना गया और तीसरी संतान तपती नामक कन्या पैदा हुई थी। आगे चलकर संज्ञा के प्रथम पुत्र वैवस्वत मनु के नौ पुत्र उत्पन्न हुए–इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, अरिष्ट, करूष और पृषध्र। (वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु से ही रघुवंशी राजा पैदा हुए, इसी वंश-परम्परा में दशरथ-पुत्र राम ने जन्म लिया।)। श्रीवराहपुराण में भी विश्वकर्मा की बेटी संज्ञा और सूर्य की ऐसी ही कथा मिलती है और यहाँ संज्ञा को परा शक्ति बताया गया है। संज्ञा से सूर्य के विवाह तथा सूर्य के तेज को छाँटकर 1/16 किये जाने तथा छाँटे हुए भाग से उल्लिखित आयुधों के निर्माण की कथा विष्णुपुराण के पृष्ठ 166-67 पृष्ठ पर भी मौजूद है और मार्कण्डेय पुराण पर आधृत यही कथा भविष्यपुराण(ब्राह्म पर्व), कूर्म पुराण(चालीसवाँ अध्याय), मत्स्यपुराण(अध्याय 101), और ब्रह्मवैवर्तपुराण(श्रीकृष्ण खण्ड) आदि में वर्णित है।

क्रमशः  .. 

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2 COMMENTS

  1. आपके द्वारा लिखें गए हर शब्द बहुत ही प्रेरणादायक होते है

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