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- डॉ. इंद्रकुमार विश्वकर्मा
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चौराहों पर आतिशबाज़ियाँ हैं,
घड़ियाँ बारह पर
जैसे साँस रोककर खड़ी हैं,
हँसी के रंगीन पोस्टर
हर दिशा में टँगे हैं
नया साल आया है,
सब यही दोहरा रहे हैं।
पर फुटपाथ पर बैठा आदमी
अपनी ही तारीख़ टटोल रहा है,
उसके हिस्से
न कोई पुराना साल था
न कोई नया आया
बस भूख जस की तस है,
और रात
उतनी ही निष्ठुर ठंडी।
संसद की सीढ़ियों पर
भाषणों का नया कैलेंडर टँगा है,
वही शब्द,
वही वादों की चमक,
वही आँकड़ों की बाज़ीगरी
गरीबी हर साल
रिपोर्टों में सिमटती है,
गलियों में नहीं।
भारत चमक रहा है
होर्डिंग्स की मुस्कानों में,
विकास दौड़ रहा है
टीवी की बहसों में,
पर गाँव के कुएँ में
पानी आज भी
पिछले साल जितना ही ठहरा है।
हम इंसानियत की बातें करते हैं,
पर इंसानियत भी अब
शर्तों पर टिकी है
जब तक सुविधा साथ है,
जब तक स्वार्थ ज़िंदा है,
तब तक रिश्ता है।
आज इंसान नहीं,
अक्सर
स्वार्थ चुना जाता है।
फिर भी
किसी झुग्गी के अँधेरे में
माँ बच्चे को रोटी खिला रही है,
आधी खुद खाकर
आधी उम्मीद बचा रही है।
यहीं से
उसका नया साल
शुरू होता है।
अगर एक हाथ
दूसरे हाथ तक पहुँच जाए,
अगर राजनीति
थोड़ी-सी इंसानियत सीख ले,
अगर प्रेम
स्वार्थ से
एक क़दम आगे बढ़ जाए
तो शायद
अगला साल
सिर्फ़ कैलेंडर नहीं,
हालात भी बदले।
नया साल
अभी एक सम्भावना है,
और निर्णय
अब भी
हमारे हिस्से में है।















