ग़ज़ल: हुक्मरानों का मौसम – डॉ. इंद्रकुमार विश्वकर्मा

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हुक्मरानों का मौसम

यहाँ हर झूठ को तक़दीर कहा जाता है
और सच बोलने वाले की तश्हीर कहा जाता है।

रोटी महँगी है, सवाल सस्ते नहीं रहने दिए
जो पूछ ले दाम, उसे देशद्रोही कहा जाता है।

विकास के पोस्टर हैं हर टूटे फुटपाथ पर
खड्डों को भी अब उपलब्धि कहा जाता है।

धर्म की आग में पकते हैं वोटों के पकवान
इंसान को बस ज़रूरत की चीज कहा जाता है।

टीवी की अदालत में फ़ैसले झटपट होते हैं
सबूत से पहले ही क़ातिल कहा जाता है।

संविधान को उठाकर मंच से दिखाया तो गया
नीचे रखते ही फिर उसे काग़ज़ी कहा जाता है।

फिर भी ये मुल्क अजीब हौसले रखता है
हर बार ठगा जाकर भी उम्मीद किया जाता है।

    • डॉ. इंद्रकुमार विश्वकर्मा

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