भारतीय संस्कृति में महाशक्ति विश्वकर्मा : मिथक और यथार्थ – खण्ड : तीन

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अमलदार ‘नीहार’
  • डॉ. अमलदार ‘नीहार’
    अवकाशप्राप्त प्रोफेसर – बलिया (उत्तर प्रदेश)

विश्वकर्मा की कला-निपुणता और वैज्ञानिक मेधा को सारी देवजाति प्रणाम करती है। उनके द्वारा निर्मित प्रासादों में आनन्द तथा विलास की नींद सोती है, उनके बनाये आयुध पाकर गर्व से फूल जाती है। मुझे नहीं लगता कि साहित्यकारों ने महान देवता विश्वकर्मा पर कभी कुछ खास लिखने की ज़रूरत समझी हो। बड़ी-बड़ी पोथियाँ लिखने वालों ने देवताओं को नाम, शक्ति, समृद्धि प्रदान करने वाले परम शक्तिमान् को उपेक्षा के खाते में डाल दिया है। उसे आधुनिक विश्व की उपलब्धियों के साथ जोड़कर उसकी वैज्ञानिक मेधा को पुरस्कृत करने का प्रयास नहीं किया। अनेक पौराणिक ग्रन्थों में इतस्ततः विकीर्ण कथाओं में वह क्षण भर के लिए निर्गुण से सगुण रूप ज़रूर धारण करता है और अपना काम करके चुपचाप रंगमंच से अदृश्य हो जाता है। वह विशाल अट्टालिकाओं से युक्त नगरों का निर्माण करता है, भव्य मन्दिर बनाता है, दिव्य आभा से पूर्ण बोलती-सी मूर्तियों की रचना कर डालता है, अद्भुत चित्रकारी करता है, ज्ञान-विज्ञान के न केवल पोथे लिख डालता है, बल्कि एक से बढ़कर एक चमत्कारी मशीनें तैयार करता है, राकेट तथा विमान तैयार करता है, इच्छा-संचालित अनेक आयुध का निर्माण कर सकता है, किन्तु आभार-अभिनन्दन की मोहक मालाएँ किसी अन्य के गले की शोभा बढ़ाती हैं। वह स्थिति आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। कई कोश खँगालने के बाद शम्भुनाथ जी द्वारा सम्पादित ‘ज्ञानकोश’ में विश्वकर्मा पर केन्द्रित अति संक्षिप्त जानकारी दी हुई मिलती है, जो पौराणिक आख्यानों में प्राप्त सूचना मात्र है, कोई विशेष विश्लेषण नहीं है। उस लेख के अनुसार विश्वकर्मा या विश्वकर्मन सृष्टि-शक्ति का रूपक है। इसमें बताया गया है कि विश्वकर्मा ने अपने प्रताप से सूर्य की उज्ज्वलता का अष्टमांश रखकर शेष ताप का हरण कर लिया; क्योंकि उनकी बेटी संज्ञा अपने पति सूर्य का ताप सहन नहीं कर पाती थी। विश्वकर्मा ने सूर्य के ताप के 7/8 भाग से विष्णु का सुदर्शन चक्र, शिव का त्रिशूल, कुबेर के अस्त्रों, कार्तिकेय के शक्तिवाण और अन्य देवताओं के अस्त्रों का निर्माण किया। वैदिक साहित्य में इन्हें देवताओं का श्रेष्ठ शिल्पी बताया गया है। इन्हें शिल्प समूह का प्रकाशक, अलंकारों का स्रष्टा, अस्त्र-शस्त्रादि का निर्माता माना गया है।

विश्वकर्मा केवल अयस्, काष्ठ, ताम्र, शिल्प तथा स्वर्णादि धातुओं तक सीमित विज्ञान-बुद्धि वाले नहीं थे, बल्कि उत्तम रथ, शिविका, दिव्य वाहन तथा इच्छाचालित विमान-निर्माण के अलावा यज्ञ कर्म में भी सुविज्ञ ब्राह्मण की भूमिका निभाते थे–

इष्टकाश्च यथान्यायं कारिताश्च प्रमाणतः।
चितोग्निब्राह्मणैस्तत्र कुशलैः शिल्पकर्मणि।।

सूत्रग्रन्थों में बताये अनुसार ठीक माप से ईंटें तैयार करायी गयी थीं। उन ईंटों के द्वारा यज्ञ-सम्बन्धी शिल्पकर्म में कुशल ब्राह्मणों ने अिर्न का चयन किया था। वाल्मीकीय रामायण के युद्ध काण्ड में सेतु-बन्ध की प्रेरणा समुद्र से प्राप्त हुई थी, उसने ही राम को यह जानकारी दी थी–

अयं सौम्य नलो नाम तनयो विश्वकर्मणः।
पित्रा दत्त वरः श्रीमान् प्रीतिमान् विश्वकर्मणः।।
एष सेतुं महोत्साहः करोतु मयि वानरः।
तमहं धारयिष्यामि यथा ह्येष पिता तथा।।

सौम्य! आपकी सेना में यह नल नामक कान्तिमान् वानर है, साक्षात् विश्वकर्मा का पुत्र है। इसे इसके पिता ने यह वर दिया है कि ‘तुम मेरे ही समान समस्त शिल्पकला में निपुण होओगे’। प्रभो! आप भी तो इस विश्व के स्रष्टा विश्वकर्मा हैं। इस नल के हृदय में आपके प्रति बड़ा प्रेम है। यह महान उत्साही वानर अपने पिता के समान ही शिल्पकर्म में समर्थ है। अतः यह मेरे ऊपर पुल का निर्माण करे। मैं उस पुल को धारण करूँगा। आनन्द रामायण-खण्ड 1, अध्याय-10 के अनुसार घृताची के गर्भ से वानर रूप में पैदा शरारती नल ऋषि ऋतुध्वज के द्वारा शापित थे, क्योंकि वे शालिग्राम को जल में छिपा देते थे। ऋषि का वह शाप भी वरदान साबित हुआ कि उनके द्वारा फेंके पत्थर पानी पर तैरेंगे। नल ने यहाँ केवल इतना स्वीकार किया कि-

मम मातुर्वरो दत्तो मन्दरे विश्वकर्मणा।
मया तु सदृशः पुत्रस्तव देवि भविष्यति।।औरसस्तस्य पुत्रोऽहं सदृशो विश्वकर्मणा।
स्मारितोऽस्म्यहमेतेन तत्त्वमाह महोदधिः।
न चाप्यहमनुक्तो वः प्रब्रूयामात्मनो गुणान्।।

मन्दराचल पर विश्वकर्मा जी ने मेरी माता को यह वर दिया था कि ‘देवि! तुम्हारे गर्भ से मेरे ही समान पुत्र होगा।’ इस प्रकार मैं विश्वकर्मा का औरस पुत्र हूँ और शिल्प कर्म में उन्हीं के समान हूँ। इस समुद्र ने आज मुझे इन सब बातों का स्मरण दिला दिया है। महासागर ने जो कुछ कहा है, ठीक है। मैं बिना पूछे आप लोगों से अपने गुणों को नहीं बता सकता था, इसीलिए अब तक चुप था। विश्वकर्मा द्वारा बनाये गया विमान पुष्पक आखि़र कैसा था, जो संवाद भी करता था-

सौम्य राम! निरीक्षस्व सौम्येन वदनेन माम्।कुबेरभवनात् प्राप्तं विद्धि मां पुष्पकं प्रभो।।
एवमस्त्विति रामेण पूजयित्वा विसर्जितम्।।
अभिप्रेतां दिशं तस्मात् प्रायात् तत् पुष्पकं तदा।

सौम्य श्रीराम! आप मेरी ओर प्रसन्नतापूर्ण मुख से दृष्टिपात करने की कृपा करें। प्रभो! आपको विदित होना चाहिए कि मैं कुबेर के भवन से लौटा हुआ पुष्पक विमान हूँ। इसके बाद श्लोक संख्या 4 से 16 तक उसका संवाद राम के साथ चलता है। मनुष्य जैसा बातूनी रोबोट अब जाकर तैयार हुआ है। किसी कवि की कल्पना भी सत्याधृत ही होती है और उसके यथार्थ में भी रंजकता का आलेप करने के लिए कल्पना का विनियोग आवश्यक होता है। इसलिए ‘रामो नाम जनैः श्रुतः’ कथा के निबन्धन में यदि यह कल्पना है भी तो निराधार नहीं हो सकती। संवाद के अन्त में पुष्पक ने ‘एवमस्तु’ कहकर राम की आज्ञा को शिरोधार्य कर लिया। इस प्रकार श्रीराम ने उसका पूजन करके जब उसे जाने की आज्ञा दे दी, तब वह पुष्पक वहाँ से अपनी अभीष्ट दिशा को चला गया।

अन्य देवशक्तियों का विवरण पौराणिक ग्रन्थों में जितने विस्तार के साथ मिलता है, उतना विशद वर्णन विश्वकर्मा भगवान का नहीं मिलता, यह घोर आश्चर्य का विषय है और विश्वकर्मा पुराण की कथा इसी समाज के लोगों की पहुँच से अभी तक बहुत दूर बनी हुई है। जिस सर्वशक्तिमान् करुणापरायण महादानी विश्वकर्मा ने त्रिदेव सहित देवता, गन्धर्व, मनुष्य तथा अन्य प्राणियों को जीवन-दान देते हुए अनेक सुख-सम्भार जुटाए, शत्रुओं से सबकी सब प्रकार से रक्षा की, माता की तरह प्यार-दुलार और पिता जैसा संरक्षण दिया, उसी को हम सब भूल गये। इसके पीछे ग्रन्थ-निर्माताओं के मन में कोई कालुष्य-कीच तो नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि देव-वैज्ञानिक को किनारे ढकेल देने से अन्य देवताओं का अहंकार और प्रच्छन्न स्वार्थ आहत होने से बच गया? विचार करने की बात है। सम्भव यह है कि साक्षात् ईश्वर और ऋषि विश्वकर्मा की परम्परा के लोग जब अपने पेशे में कुछ यूँ रम गये कि श्रमजीवी की श्रेणी में परिगणित होने लगे और उनके हाथ से लेखनी छूट गयी तो प्रभुवर्ग के आस-पास जुटे मंत्री तथा पुरोहित आचार्यों ने ही अपने सूत्रग्रन्थों के निर्देशानुसार उन्हें कदाचित् सामाजिक व्यवस्था में दासत्व की ओर ढकेल दिया हो। इतिहास साक्षी है, कई बार निःस्वार्थ त्याग करने वाले बलिदानी शूरवीर, सुयोग्य विद्वान अथवा सन्त महात्मा गुमनाम चले जाते हैं दुनिया से। बड़े-बड़े राजाओं को विजय दिलाने वाले इतिहास के पन्नों से अचानक गायब हो जाते हैं या उपेक्षा के खाते में डाल दिये जाते हैं। स्वतन्त्रता-आन्दोलन के कितने सिपाही कालकोठरियों में क़ैद, हमारी स्मृतियों के गलियारे में गु़म हो गये। कई बार सत्ता प्रतिभा की ताकत को क्रय कर लेती है और उसका मनमाना उपयोग करती है, उसके बल पर प्राप्त सफलता का श्रेय उसे नहीं देना चाहती। जिन राजाओं ने बड़े-बड़े स्मारक अथवा महल बनवाये, उनके शिल्पकला-कुशल वैज्ञानिकों के नाम कितने लोगों को याद हैं? सुनते हैं कि कई राजाओं ने सुन्दर महल बनाने वाले कारीगरों के हाथ तक इसलिए कटवा लिए कि दुबारा उतने खूबसूरत महल का निर्माण सम्भव न हो सके। कितना निकृष्ट कर्म किया ऐसे लोगों ने कि उनकी कला की निर्मम हत्या कर दी। इन्द्र आदि ने भी अपने महान अभियन्ता, वैज्ञानिक और गुरु विश्वकर्मा तथा उनके पुत्र विश्वरूप के साथ यही किया था। उल्लिखित ग्रन्थों में विज्ञान-देवता विश्वकर्मा का जो वृत्तान्त मिलता है, उसमें बड़ी विसंगतियाँ देखने को मिलती हैं, लेकिन प्रतीकों में आविष्ट निहितार्थ समझ में आ जाता है। कहीं पर उन्हें भगवान शंकर का अवतार कहा गया है, क्योंकि भगवान विश्वकर्मा भी पंचानन(पाँच मुखों वाले) माने गये हैं और उनके मुखों के नाम हैं-1. सद्योजात, 2. वामदेव, 3. अघोर, 4. तत्पुरुष, 5. ईशान। वास्तव में भगवान शंकर के पाँच मुखों के नाम भी यही हैं। अन्यत्र विश्वनिर्माण की दृष्टि से स्रष्टा का अर्थ ब्रह्मा भी होता है और विश्वकर्मा भी। विष्णु भी विश्वकर्मा की संज्ञा से अभिहित है ही। शब्दकोश ‘विश्वकर्मा’ का अर्थ जगत्कारक परमात्मा ईश्वर, ब्रह्मा और भगवान शंकर स्वीकार करे तो यह उचित ही है। रचनाधर्मिता की दृष्टि से विधाता और विश्वकर्मा एक ही हैं। अपने आयुधनिर्माण के ज्ञान के कारण वे प्रलयकारक शंकर भी हैं अथवा लोकमंगल की भावना के कारण वे शिव ही हो सकते हैं। जैसे भूतभावन शिव जगत का कल्याण करने वाले हैं, विश्वकर्मा का स्वभाव भी वैसा ही है, अतः दोनों में अभेद है। अपनी स्थापत्य कला से उन्होंने त्रिभुवन को सुन्दर, वैभव-सम्पन्न और सुखमय तथा जीवनोपयोगी बनाया। समुद्र राम को भी विश्व का स्रष्टा विश्वकर्मा कहता है तो यह निरभिप्राय नहीं है। बहुत सारे ग्रन्थों में विश्वकर्मा के नाम का उल्लेख भर प्राप्त होता है और कथा का कोई तार छूकर चला जाता है। जैसे दियासलाई की तीली से दीपक जला लिया। अब जब तक दीपक जल रहा है, दियासलाई की जरूरत नहीं। दीपक बुझ जायेगा तो उसकी तलाश की जायेगी। कुछ ही ग्रन्थ ऐसे हैं, जिनमें वंश-परिचय के साथ विशेष रूप से उनके विषय में संक्षेप में कुछ बताया गया है।

मुझे त्वष्टा-तनय विश्वरूप की हत्या तथा त्वष्टा द्वारा निर्मित विशेष आयुध अथवा वृत्र नामक महाशक्तिशाली योद्धा(जो इन्द्र से प्रतिशोध हेतु पैदा किया गया था, इसीलिए असुर रूप में चिह्नित किया गया, जब कि वह सदाचारी तथा धर्मात्मा था और उसकी हत्या के बाद इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप लगा था। इन्द्र के उस पाप को) को मारने अथवा नष्ट करने के लिए विश्वकर्मा द्वारा वज्र बनाकर देने की कथा में रामायण में अन्यायपूर्वक शम्बूक-हत्या के हास्यजनक हेतुओं की तरह विरोधाभास, विसंगति और अतिरंजना का झोल दिखायी देता है। त्वष्टा को यजुर्वेद के अध्याय तेरह के मन्त्र संख्या पन्द्रह के मन्त्रद्रष्टा के रूप में जाना जाता है। इन्हीं त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप हुए जो अग्नि तथा जल-विज्ञान के ज्ञाता थे।

विश्वरूप ने नारायण कवच का निर्माण किया था। विश्वरूपजी इतने प्रतापी थे कि देवगुरु बृहस्पति(जो महान विश्वकर्मा के मामा थे) की अनुपस्थिति में ब्रह्मा की आज्ञा से इन्द्रादि ने इन्हें श्रेष्ठ ब्राह्मण विश्वकर्मा के कुल के कारण ‘देवगुरु’ के आसन पर बैठने के लिए निवेदन किया। विश्वरूप ने शुरू में तो पौरोहित्य कर्म की बड़ी निन्दा की(रामायण में भी पौरोहित्य कर्म को नीच कोटि का माना गया है। अहंकारी इन्द्र की अशिष्टता से क्रोधित गुरु बृहस्पति अदृश्य हो गये और उन्हें कोई नहीं ढूँढ़ पाया।), किन्तु अन्ततः देवताओं के हित को ध्यान में रखते हुए उनका गुरु और पुरोहित बनना स्वीकार कर लिया। देवताओं के आचार्य पद पर प्रतिष्ठापित विश्वरूप ने असुरों पर विजय प्राप्त करने हेतु वैष्णवी विद्या प्रदान की थी, किन्तु नीचप्रवृत्ति कुटिल इन्द्र ने अपने ही गुरु की हत्या का घोर घृणित पाप किया।

कहते हैं कि विश्वरूपजी एक मुख से सोम का, दूसरे से सुरा का एक साथ पान करते थे और तीसरे मुख से अन्न ग्रहण करते वेदों का उच्चारण किया करते थे। वे भगवान शंकर की तरह समदर्शी थे और असुरों का भी अहित नहीं चाहते थे। बृहस्पति गुरु की अनुपस्थिति में विश्वरूप ने देवताओं की दैत्यों से रक्षा की, किन्तु इन्द्र ने उन्हें असुरों का हितैषी समझ छलपूर्वक उनकी हत्या कर दी और विश्वकर्मा और त्वष्टा के भय से एक वर्ष तक जल में छिपकर रहे। तब त्वष्टा ने अपने तेज से इन्द्र के वध के लिए वृत्रासुर नामक यज्ञपुत्र उत्पन्न किया। वृत्रासुर ने समस्त देवसमुदाय के हृदय में भय का संचार कर दिया। ऋग्वेद, यजुर्वेद और तैत्तिरीय ब्राह्मण ग्रन्थ के अनुसार त्वष्टा ने ही वृत्रासुर के वध के लिए वज्र बनाकर इन्द्र को दिया था। श्रीमद्भागवत के अनुसार वृत्र को समाप्त करने के लिए विश्वकर्माजी ने वज्र का निर्माण किया था। कहीं ऐसा तो नहीं कि वृत्रासुर का कोई और प्रतीकात्मक अर्थ हो? इन्द्र ने अपने गुरु विश्वरूप (देवगुरु वृहस्पति के भागिनेय का पौत्र होने के कारण भी आदरणीय थे।) की हत्या करके चाहे जितना बड़ा पुण्य किया हो, किन्तु अब इन्द्र के प्राण संकट में थे, सो छिपते फिर रहे थे।

विश्वरूप के तेजस्वी पिता त्वष्टा और परम प्रतापी विश्वकर्मा के सम्मुख अपराधी मुख दिखाने के योग्य तो थे नहीं। विश्वकर्मा कुल का तेजस्वी पुत्र विश्वरूप उस गुरुहन्ता देवराज की कृतघ्नता का शिकार हो गये तो क्रोध और शोक की एक लहर-सी दौड़ गयी पूरे परिवार में। उल्लिखित कथा के अनुसार एक बात और ध्यातव्य है कि विश्वकर्मा के पुत्रों का मातृकुल असुरों से सम्बन्धित था तो पितृकुल देवताओं से। श्रीमद्भागवत के अनुसार विश्वरूप छल पूर्वक असुरों को भी अर्घ्य प्रदान कर रहे थे। कदाचित् गुरु विश्वरूप की निष्पक्षता या तटस्थता से देवराज को सन्देह हुआ होगा कि वे असुरों का हित साध रहे हैं अथवा खुलकर मेरी हर बात का समर्थन नहीं कर रहे हैं। चापलूसीपसन्द राजा प्रत्येक युग में हर किसी को अपनी महत्त्वाकांक्षा-पूर्ति हेतु गुलाम बनाकर रखना चाहता है, चाहे वह उसका गुरु या शिक्षक ही क्यों न हो। इस सन्देह ने उनके स्वार्थी और कलुषित हृदय को गुरु की हत्या के लिए प्रेरित किया होगा। इन्द्र के भ्रष्ट आचरण की दूसरी भी अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं।

विश्वकर्मा के ही दान से समृद्ध इन्द्र उनके कुलात्मज विश्वरूप जैसे महान गुरु का हन्ता बना, जिससे उसके ऊपर ब्रह्महत्या का पाप लगा। जिसके दिये नारायण कवच से उसे विजय मिली, उसी का हत्यारा बन गया देवताओं का वह पतितचरित्र राजा इन्द्र। यह पाप उसे दुबारा भी लगा, जब उसने वृत्रासुर की हत्या की और चार हिस्सों में बाँटे गये उसके पाप का फल पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्री ने ग्रहण किया। गुरु के आचरण से भी इतना अवश्य प्रकट होता है कि उनके भीतर ऐसे संस्कार अवश्य मौजूद थे, जिससे यह भान होता है कि वे भगवान भूतभावन शंकर की तरह सुर तथा असुर दोनों के प्रति कृपालु रहे होंगे। पंचानन भगवान शंकर के ही नाम वाले विश्वकर्मा के पाँच मुखों (सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोरमुख और ईशान) का योग अनायास नहीं जान पड़ता। इसी प्रकार उनके पौत्र विश्वरूप के एक मुख से सोम, दूसरे से सुरा का पान यह संकेत देता है कि वे दोनों जातियों को महत्त्व देते थे। कदाचित् दोनों में मेल कराना चाह रहे हों। तीसरे मुख से वेदमन्त्रों का उच्चारण उनके परम ज्ञानी होने का संकेत करता है, किन्तु उनकी ज्ञान भरी बातों से इन्द्र को क्या लेना? उसके स्वर्ग पर कोई आँच न आये, उसको सदैव यही चिन्ता बनी रहती थी। जब उसने विश्वरूप की हत्या की तो त्वष्टा और विश्वकर्मा बेहद कुपित हुए होंगे। ऐसी स्थिति में शोकाकुल किसी भी व्यक्ति के हृदय में एक अन्धकार-सा छा जाता है, यह स्वाभाविक बात है। उसके लिए पूरे संसार में बस अँधेरा छा जाता है और हुआ भी यही।

कोश में वृत्र का अर्थ दिया हुआ है-एक राक्षस का नाम, जिसे इन्द्र ने मार गिराया था(वह अन्धकार का मूर्त रूप माना जाता है)। यह त्वष्टा के भीतर का क्रोधरूपी तामसी अन्धकार था, जिसे उन्होंने क्रोधवश बाहर सृजित कर समूची सृष्टि को आच्छादित कर दिया। वृत्र का अर्थ मेघ भी होता है, जो अधिक घनीभूत होकर अँधेरा पैदा कर देता है और वज्र उसी का या तो विलोम है या एक ऐसी विरोधी वृत्ति, जिससे प्रकाश फैल जाता है। वज्र इन्द्र का आयुध है तो बादलों के गर्जन-तर्जन का तेज भी है, उनकी शोभा बढ़ाने वाली तथा सान्द्र अन्धकार को विच्छिन्न करने वाली शम्पा। दधीचि के मेरुदण्ड से यह इन्द्रायुध वज्र भी विश्वकर्मा ने ही बनाया था, जिसे धारण कर इन्द्र ने पर्वतों के पंख काट दिये थे। इसीलिए वे ‘पर्वतारि’ भी कहे गये हैं। अजीब संयोग यह है कि वृत्र का अर्थ पर्वत भी होता है और मेरु अथवा सुमेरु भी है एक पर्वत, तो त्वष्टा ने घना अन्धकार पैदा कर दिया या सब कुछ मेघाच्छादित कर दिया अथवा पर्वतों से स्वर्ग को रूँधकर इन्द्र को कैद कर लिया। देवताओं की प्रार्थना से वज्र बनाकर विश्वकर्मा ने उन पर्वतों, बादलों अथवा अन्धकार से त्रिभुवन को मुक्त किया। इस प्रकार सम्भव यही जान पड़ता है कि वृत्र एक प्रकार का आयुध रहा होगा, जिसका सामना करने में इन्द्र असमर्थ रहा होगा। तब अन्य देवताओं के साथ विष्णु ने अपने बड़े भाई इन्द्र(वामन रूप में अदिति के गर्भ से जन्म लेने के कारण विष्णु ‘उपेन्द्र’ कहलाए) की रक्षा के लिए विश्वकर्मा को उस अस्त्र का प्रतिरोधी अस्त्र वज्र बनाने के लिए मनाया होगा और इस प्रकार गुरुहन्ता नीच देवेश की प्राणरक्षा हुई।

आज की दुनिया में परमाणु बम बनाने वाले और बड़े-बड़े आविष्कार करने वाले वैज्ञानिकों जैसे ही रहे होंगे विश्वकर्मा-परिवार के लोग। यदि कथा का सीधा-सपाट अर्थ ग्रहण करना चाहें तो भी इन्द्र महापातकी ही सिद्ध होता है। ब्रह्महत्या के दोष के कारण पुरीषलिप्त करूषक्षुब्ध इन्द्र की क्या दुर्गति हुई इसे शास्त्र-पुराण बाँचने वाले सभी जानते हैं। जो भी हो, ईश्वर के लीलावतारों तथा देवकथाओं को लेकर वेद-पुराणादिक ग्रन्थों में वैविध्यपूर्ण विसंगतियाँ भरी पड़ी हैं, पर एक बात निर्विवाद है कि विश्वकर्मा के अस्तित्त्व को नकारना किसी के वश की बात न थी। समस्त देवजाति के हित को या यूँ कहिए कि अपने राष्ट्र की रक्षा को ध्यान में रखकर वज्र बनाने का कार्य चाहे त्वष्टा ने किया हो या विश्वकर्मा ने, किन्तु यह बहुत त्याग और बलिदान की बात है। लोकमंगल की भावना रखने वाले विश्वकर्मा ने कुल के महान पण्डित और वैज्ञानिक विश्वरूप का बलिदान कर दिया। पुत्रमोह में पड़े धृतराष्ट्र-बुद्धि वाले किसी व्यक्ति में इतना साहस कहाँ हो सकता है? श्रीमद्भागवत में वृत्रासुर के शौर्य का जिस प्रकार वर्णन किया गया है, वह देवताओं को लज्जित करने वाला है। वह वृत्रासुर समस्त देवजाति के हित के लिए इन्द्र को स्वयं अवसर देकर वज्र उठाकर अपनी हत्या के लिए प्रेरित करता है। क्षण भर ठहरकर विचार करें, क्या वृत्र का यह स्वभाव आसुरी हो सकता है? शत्रु को अपनी हत्या करने के उपयुक्त अवसर का सुझाव देने वाला वृत्र त्वष्टातनय हो चाहे उनका बनाया हथियार, वह तो दिव्य तेज से स्वयं आलोकित है-आत्मबलिदान से मण्डित व्यक्तित्त्व। वह असुर नहीं हो सकता था। असुरों से भी नीच काम तो इन्द्र ने किया गुरु की हत्या करके। ऐसा नीच कर्म तो राक्षसों ने भी कभी न किया होगा। कदाचित् भगवान विश्वकर्मा या त्वष्टा द्वारा बनाये वज्र को सम्मान देने के लिए वृत्र ने अपने प्राणों की आहुति दी होगी। यह उसकी महानता अथवा बलिदान भावना थी।

भगवान विश्वकर्मा के पाँच पुत्र हुए-मनु, मय, त्वष्टा, श्ल्पि या तक्ष तथा विश्वज्ञ या दैवज्ञ। इनमें से मनु का कांचना से, मय का सौम्या से, त्वष्टा का जयन्ती से, शिल्पी का करुणा से तथा दैवज्ञ का चन्द्रिका से विवाह सम्पन्न हुआ। ये सभी ऋषि कन्याएँ थीं। सभी लौहकर्मी, काष्ठकर्मी, शिल्पकर्मी(मूर्तिकला तथा स्थापत्य कला में निपुण), कांस्यकर्मी(ठठेर) और धातुकर्मी(रत्न तथा स्वर्णभूषणादि के कारीगर), भगवान विश्वकर्मा के इन्हीं पाँच महान पुत्रों की सन्तानें हैं। मैं विश्वकर्मा के इन पाँच पुत्रों को पंच महाभूतों का प्रतीक मानता हूँ-आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु। ये पंच महाभूत ही शरीर-घट का निर्माण करने वाले पाँच कारक हैं। ये पाँच महाशक्तियाँ संसार-रचना के पाँच परमाणु हैं। इनका विस्फोट भयानक है। ये पूरी दुनिया में मानव-शरीर की पाँच ज्ञानेन्द्रियों के समान महत्त्वपूर्ण हैं। महाभारत के पाँच पाण्डव हैं ये, किन्तु एकत्वभाव न होने के कारण शक्तिहीन हो गये हैं आज।

भगवान विश्वकर्मा की कला-कारीगरी और वैज्ञानिक उपलब्धियों की अनेक कथाएँ बिखरी पड़ी हैं। उन्होंने लंका नगरी का ऐसा निर्माण किया था, जैसा कोई न कर सकता था, किन्तु स्वर्गलोक अमरावती की ऐसी सुन्दर रचना की थी कि तपोसंचित बलप्राप्त कोई भी असुर पहले स्वर्ग की ही कामना करता था। स्वर्ग के भोग की कल्पना ही असुरों को मतवाला कर देती थी। इसके अलावा शिवलोक, वरुणलोक, यमलोक, कुबेर की अलका की सुन्दर रचना की। शिव के कहने पर उन्होंने सोने की लंका का भी निर्माण किया था। उनके द्वारा निर्मित द्वारिका की रचना भी कुछ कम सुन्दर न थी। उन्होंने श्रीकृष्ण के निवेदन पर सुदामापुरी की रचना की थी। पाण्डवों के लिए खाण्डव वन में इन्द्रप्रस्थ नामक सुन्दर नगर का निर्माण किया। मनोजवगामी संवाद करने वाला पुष्पक विमान विश्वकर्मा ने ही बनाया था, जो इतना विशाल था कि पूरी वानर-बरूथिनी सहित राम, लक्ष्मण और सीता, सभी उसमें आरामपूर्वक बैठ सकते थे। विश्वकर्मा की ही कृपा से सभी देवता अद्भुत शक्तियों से सम्पन्न थे। प्रकारान्तर से विश्वकर्मा को शक्ति, तेज और यन्त्र-विद्या का प्रतीक मान सकते हैं। वे सुदर्शन चक्र और शार्ङ्ग के रूप में विष्णु के साथ थे, शूल के रूप में शंकर के साथ थे, करवाल के रूप में महाकाली के साथ थे, परशु सहित अनेक अस्त्र-शस्त्रों के रूप में महाशक्ति दुर्गा के साथ थे, वज्र के रूप में इन्द्र के साथ, वरुणास्त्र के रूप में वरुण के साथ थे-आग्नेयास्त्र के रूप में अग्नि के साथ-ब्रह्मास्त्र के रूप में सभी तेजस्वी-तपस्वी महावीरों के साथ। ऐसे भगवान विश्वकर्मा के पुत्र जो पूरी दुनिया में हुनरमन्द कारीगरों तथा इंजीनियरों के रूप में फैले हुए हैं, आज भी जिस वस्तु को अपने हाथ का जादू भरा स्पर्श दे देते हैं, वह वस्तु लाख और करोड़ की हो जाती है। जिसे यूँ कह सकते हैं कि ये लोग मिट्टी को भी सोना बनाने में लगे हैं और अपने-अपने राष्ट्र को उन्नति के शिखर तक ले जा रहे हैं। हमारा ज्ञान-विज्ञान उसी आदि पुरुष महान विश्वकर्मा का न्यास है, जिसे फैलाने का दायित्व विश्वकर्मा-पुत्र चुपचाप निभाते चले जा रहे हैं। कम से कम इतना बोध इन पुत्रों को अवश्य होना चाहिए कि वे दीपकधर्मी हैं, इसलिए अन्धकार के सामने कभी सिर नहीं झुकाएँगे। भगवान विश्वकर्मा के इन न्यासियों को वह पूर्व सम्मान उनकी वृत्तिगत योग्यता के कारण मिलना ही चाहिए, लेकिन जिस प्रकार देवताओं के राजा इन्द्र ने विश्वकर्मा और उनके पुत्रों को समुचित सम्मान नहीं दिया था, उसी प्रकार आज भी इन्द्रत्वप्राप्त शासन-शक्तियाँ तेजस्वी विश्वकर्मा-पुत्रों की अवहेलना करती चली आ रही हैं। आप सुदूर इतिहास के अयन से वर्तमान के फलक तक चले आइये, उनकी प्रतिभा, उनकी उपलब्धियाँ छिपायी जाती हैं और उनके महत्त्व को रेखांकित नहीं किया जाता। सतत सृजन तथा शोध के कार्य करती है यह विश्वकर्मा-चेतना और उसके सुफल के भोक्ता कोई और होते हैं।

मिथकीय आख्यानों से विलग हमें सभ्यता की विकास-यात्रा का भी अवलोकन जरूर करना चाहिए। सृष्टि का उद्भव कब और कैसे हुआ, इस विषय में सप्रमाण कुछ कह पाना अति कठिन है। अनेक जीव-जन्तुओं में मनुष्य नाम के इस प्राणी ने सभ्यता की सीढ़ी पर पहला कदम कब रखा, यह भी ठीक-ठीक बता पाना सम्भव नहीं; किन्तु यह सच है कि मनुष्य ने धीरे-धीरे अन्य जीव-जन्तुओं से अपनी पृथक् पहचान बना ली और उसके सम्मुख विशालकाय जानवर भी निर्बल-निरीह बनकर रह गये। मानवीय सृष्टि के विकास की नैसर्गिक रूपरेखा की एक आंशिक झाँकी तो देख लीजिए–‘‘गिल्बर्ट और सलविन के शब्दों में कहें तो प्रोटोप्लाज्मल ‘प्राइमॉर्डियल अटॉमिक ग्लोब्यूल’ यानी आदिम आणविक जीवद्रव्य की बूँदों से सीधी मुद्रा में खड़े चेतन मानव की अवस्था तक पहुँचने के लिए आपको काफ़ी लम्बे समय तक बार-बार एक नियमित ढंग से नये गुणों में परिवर्तित होना पड़ा है, तो पिछले 3.8 बिलियन वर्षों के दौरान आपने पहले ऑक्सीजन को घृणित समझा, फिर उस पर मोहित हुए। आपके मीनपक्ष और भड़कीले पंखों का विकास हुआ, फिर आपने अण्डे दिये, अपनी दो सिरे वाली जीभ को हवा में झटका दिया, फिर आपका चिकना स्वरूप सामने आया, उसके बाद आपके रोम उग आये, आप ज़मीन के नीचे रहे, पेड़ों पर रहे, हिरण जितने बड़े और चूहे जितने छोटे रहे, आप लाखों रूपों में अस्तित्व में रहे। इनमें से किसी भी विकासमूलक अनिवार्यता से अगर आप ज़रा भी इधर-उधर हुए, तो मुमकिन है आप किसी गुफा की दीवारों पर उगे शैवाल को चाट रहे होंगे या किसी पथरीले समुद्र-तट पर वालरस(यह एक विशाल मीनपक्षी स्तनपायी है, जो आर्कटिक महासागर और उत्तरी गोलार्द्ध के उपआर्कटिक समुद्रों में पाया जाता है) जैसे जीव के रूप में आराम से पड़े होंगे या फिर स्वादिष्ट कीड़े खाने के लिए साठ फीट गहरा गोता लगाने से पहले अपने सिर पर बने छेद से हवा बाहर छोड़ रहे होंगे।’’29 निस्सन्देह पहले न तो समाज था, न सभ्यता भी, न देश था, न राज्य। जिसकी शक्ति का जितना प्रसार था, वहाँ तक उसका साम्राज्य था। शक्ति-परीक्षण के संघर्ष में विषय की कामना ने जब कभी अपने समान रूप-आकृति वाली मानव-जाति को एकता के लिए प्रेरित किया होगा, सम्भवतः तभी से मानव-समाज की रचना का आरम्भ हुआ होगा। फिर एक साथ रहने से संकेत-स्वर आदि के माध्यम से प्रेम की अभिव्यक्ति ने पारस्परिक सम्बन्धों को सुदृढ़ बनाया होगा। जीवन-यापन के लिए अनेक साधन अपनाये गये होंगे। इस प्रकार एक सुदीर्घ अन्तराल के बाद पत्थरों के हथियार छोड़ शिकार करने के लिए लोहे के हथियार बनाये गये। कृषि कार्य के लिए यन्त्र बनाये गये। दूसरी ओर चित्रलिपि और फिर अलग-अलग ध्वनियों के लिए अलग-अलग संकेत-चिह्न बनाये जाने लगे। पहनावे में धीरे-धीरे बदलाव आया। जीवन में सभ्यता का अवतरण हुआ और कालान्तर में समूहबद्ध होने से संवाद हेतु एक तरह की भाषा बोलने वाला मनुष्य एक सामाजिक प्राणी बनता गया। सामाजिक प्रगति के लिए किसी कार्य विशेष में कुशलता प्राप्त करने के लिए ही कार्यों का वर्गीकरण किया गया और बिना किसी भेदभाव के सबको उनकी रुचि तथा आवश्यकता के अनुरूप अलग-अलग कार्य सौंप दिये गये। जैसे एक परिवार में अलग-अलग कार्य बाँट दिये जाते हैं और सबसे सम्यक् कार्य-सम्पादन की अपेक्षा की जाती है और इस प्रकार कोई भी व्यक्ति अपने कार्य का हुनरमन्द विशेषज्ञ हो जाता है, कालान्तर में उसकी यही विशेषज्ञता उसकी जातीय पहचान के रूप में समाज में स्वीकृत कर ली जाती है।

(‘भारतीय संस्कृति और हिन्दी साहित्य’ (आलोचना) ग्रन्थ में संगृहीत है यह आलेख)

क्रमशः  .. 

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