ओ जीज़स! – हूबनाथ पाण्डेय

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हूबनाथ पाण्डेय

तुमने कहा था
लौटोगे तुम
हमने प्रतीक्षा की
हज़ारों वर्ष
हमने कुछ नहीं किया
सिर्फ़ प्रतीक्षा की
कि तुम आओगे
हमारे पापों को
अपने सिर लेकर
हमें मुक्ति दोगे
इसलिए
हमने सिर्फ़ पाप किए
और प्रतीक्षा की तुम्हारी
हम बाट जोहते रहे
उस तारे की
ख़बर देता जो
तुम्हारे आने की
ज्योतिषियों से पूछते रहे
अवतरित होने की जगह
जिससे बचा सकें
इस बार तुम्हें
अत्याचारी दंभी
निरंकुश शासन से
हमने ठान लिया था
नहीं लटकने देंगे
इस बार तुम्हें सलीब पर
तुम्हारे अहसानों और
अपने पापों के बोझ तले
हमने तै किया था
इस बार
अकेले नहीं रहने देंगे तुम्हें
खड़े होंगे हम सभी
तुम्हारे साथ
पर सोचा भी न था
कि तुम आओगे इस बार
किसान बन कर
और कड़कड़ाती ठंड में
जम जाओगे
राजधानी के सिवान पर
पिछली बार भी
नहीं पहचान पाए थे हम
सत्ता के आतंक तले
निरीह भेड़ों की तरह
सिर झुकाए
कटने की प्रतीक्षा में
आज ही की तरह थे तब भी
हमें यक़ीन है
इस बार भी तुम
माफ़ कर दोगे हमें
हमारे पापों के लिए
कि इस बार भी
साथ नहीं दे पाए तुम्हारा
इस बार भी
क्रूर शासन
हमारी आंखों के सामने
सलीब पर टांगता रहा तुम्हें
लहूलुहान तुम
निहारते रहे हमें
एकटक
तुम्हारी आंखों में भय नहीं
होठों पर कराह नहीं
मन में मलाल नहीं
चेहरे पर वही भव्यता
हज़ारों साल पुरानी
बिस्मिल अशफ़ाक
भगत सिंह की तरह
अपने क्षुद्र स्वार्थ
कमीनी मनोवृत्तियों
के सुविधाजनक खोल में
सुरक्षित (?)
इस बार भी हम
सिर्फ़ तमाशबीन की
नकारा भूमिका में ही रहे
कल हम करेंगे गुणगान
तुम्हारी सहनशीलता
महानता श्रेष्ठता का
अपनी नीचता के गर्त में
पड़े पड़े देह पालते
आत्मा का हनन करते
फिर करेंगे प्रतीक्षा
तुम्हारे आने की
फिर लेंगे संकल्प
तुम्हारे साथ खड़े होने की
फिर रखेंगे अपेक्षा
कि इस बार भी हमें
तुम माफ़ कर ही दोगे
और करोगे प्रायश्चित
उन पापों के
जो किए हमने
पूरे होशोहवास में
हमारी कायरता का दंड
तुम्हीं भोगोगे
इस बार भी
हर बार की तरह.

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