गोविंदा आला रे! (कविता )

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dahi handi

विभिन्न राजनेताओं को
अपनी पीठ पर लादे
ईश्वर के सहारे
निकल पड़े हैं गोविंदा
मुंबई की सड़कों पर

जन्माष्टमी के दूसरे दिन
कृष्ण के बहाने
राजनीति चमकाने
सियासत भी उतर गई है
मुंबई की सड़कों पर

दैत्याकार होर्डिंग्स, बैनरों में
गर्व से मदमाती सियासत के
सहृदय सौजन्य से
लाखों रुपयों की हंडियाँ
लटक रही हैं
ऊँचे आसमान पर
मुंबई की सड़कों पर

छोटी बड़ी कई उम्र के
बच्चे, नौजवान गोविंदा
प्रायोजित गणवेश में
प्रायोजित पेट्रोल और ट्रकों में सवार
गगनभेदी नारे लगाते
लबालब उल्लास और उत्साह में
निकल पड़े हैं
मुंबई की सड़कों पर

इन गोविंदाओं में
न किसी मंत्री का सपूत है
न उद्योगपति का नौनिहाल
न पूँजीपति का लाल
न किसी राजनेता का बाल

वे सभी
सड़क किनारे
सजे धजे पंडाल या मंच पर
अपने समय पर विराजेंगे
जहाँ उत्साहवर्धक
फ़िल्मी गीत बज रहे होंगे
और बड़े से फलक पर
रुपयों के आँकड़े छपे होंगे
और छपी होगी जनता
सड़क के चप्पे-चप्पे पर

सात,आठ,नौ,दस, ग्यारह
स्तरों के मानवी मीनार
एक के ऊपर एक
मिट्टी की उस हंडी को
फोड़ने का प्रयास करेंगे
जिसके बाद मिलेंगे
रुपए लाखों

इसी कोशिश में
गिरेंगे गोविंदा
घायल होंगे गोविंदा
हाथ पैर सिर फूटेंगे उनके
और सियासत ने
सुसज्ज रखें हैं
सरकारी अस्पताल
दिए जाएँगे मुआवज़े

कभी रिमझिम
कभी मूसलधार
बारिश के बीच
छोटे बड़े गोविंदा
चढ़ेंगे मानवी मीनार पर
यह सोचकर
कि इन पैसों से
थोड़ी ही सही
दूर होंगी
कुछ आर्थिक तकलीफ़ें
थोड़ी मौजमस्ती हो जाएगी
थोड़ा मज़ा आ जाएगा
और हो सकता है
कि साहब की नज़र में आ जाऊँ
तो किस्मत भी सँवर सकती है

मुंबई की सड़क पर खड़ी
बेतहाशा भीड़
अपनी बालकनी से झाँकते
सुरक्षित नागरिक
हंडी फूटने से ज़्यादा
मीनार के ढहने का
आनंद उठाते हैं

और मंच पर सवार
वर्तमान ,भावी सियासत
भीड़ को वोटर समझकर
मुदित हो जाती है
वैसे भी
लाखों रुपए ईनाम के
सियासत की जेब से नहीं जाते

और बरसों में
धीरे-धीरे
मुंबई की पहचान
एक सांस्कृतिक पर्व
राजनीतिक इवेंट में
बदलने लगता है। 

    • हूबनाथ 

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