गुड फ्राइडे (कविता) – हूबनाथ पांडेय

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मन जब भी होता है संकट में
सबसे पहले
तुम याद आते हो
याद आता है
तुम्हारा साहस
तुम्हारी ज़िद
और सबसे ज़्यादा
तुम्हारी निर्भयता
दुबले पतले
निहायत मामूली जिस्म में
आकाश जैसी आस्था
धरती सी सहनशीलता
मुझे किसी और में
दिखाई नहीं पड़ती
हो सकता है
मेरी दृष्टि की सीमा हो यह
विचारों को जीवित रखने
प्राणों की बाज़ी बदने
वह भी ख़ुद के लिए नहीं
दुनिया भर के तमाम
अदने निरीह बेबस
मामूली लोगों के लिए
कितने बड़े आततायी
साम्राज्य के आगे
तन कर खड़े थे तुम
सलीब के बोझ से
कंधा झुका था आत्मा नहीं
अपने कमाए सत्य बचाने
कितनी बड़ी कीमत
चुका रहे थे तुम
तुम्हारे जर्जर हाथ पैरों में
निर्दयता से ठोंकी गई थी
अमानवीयता की कील
और चीख़ की जगह
दुआ निकली
अन्यायियों के लिए
कोई नहीं तुझसा
पूरी मानव सभ्यता में
एक भी
हां! तेरे जैसा बनने की
कोशिश बहुतों ने की
कुछ सफल कुछ असफल
पर याद एक तू ही आता है
आज ही नहीं
उस प्रत्येक पल
जब छाते हैं बादल संकट के
घिरता है अंधेरा घटाटोप
सूझता नहीं कुछ भी
महसूस होता नितांत
अकेलापन असहाय
तब तू याद आता है
और मैं अकेला नहीं होता.

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