ईद मुबारक (कविता ) – हूबनाथ पांडेय

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क़ायनात की पहली ईद
साथ-साथ चले
रमज़ान और मुहर्रम
एक तरफ़
करोड़ों रोज़ेदार
दूसरी तरफ़
लाखों लड़ रहे
दो घूंट पानी के लिए
एक पूरी क़ौम हिजरत में
ज़िंदगी की तलाश में
यज़ीद कौन ये पता नहीं
लेकिन
क़र्बला में गिर रही
लाशें बेकस मासूमों की
मातम के काले साए में
धधकता हुआ रमज़ान
थमी हुई सांसें
दुआ में उठे करोड़ों हाथ
आसमान से टकराकर
लौटती बेबस दुआएं
उतने ही बेबस मज़दूर
लौटते हैं इस मुबारक ईद
जिसमें न तो ईद है
न मुबारक ही
न रोज़े ही ख़त्म हो रहे
न क़र्बला ही थम रहा
कैसा खेल है क़ुदरत का
क़ायनात में पहली बार
साथ-साथ चल रहे
दो मुक़द्दस महीने
कई महीनों से.

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