कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में मनुष्य: क्या हम अपनी संवेदनाएँ खो रहे हैं..? – Dr. Indrakumar Vishwakarma

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Artificial Intelligence
  • डॉ. इंद्रकुमार विश्वकर्मा

मशीनों ने शब्दों के जंगल उगा दिए हैं,
पर मन की मिट्टी अब भी सूनी है।

इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक का भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ तकनीक केवल हमारे जीवन को सुविधाजनक नहीं बना रही, बल्कि हमारी सोच, भाषा, संबंधों और संवेदनाओं को भी पुनर्परिभाषित कर रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) अब विज्ञान-कथा का विषय नहीं रही; वह हमारे मोबाइल फोन, कार्यालयों, विद्यालयों और यहाँ तक कि हमारी रचनात्मकता में भी प्रवेश कर चुकी है।

आज एक विद्यार्थी निबंध लिखने के लिए AI का सहारा लेता है, एक पत्रकार समाचार का प्रारूप AI से तैयार कराता है और एक लेखक कहानी के कथानक पर सुझाव लेने लगा है। प्रश्न यह नहीं है कि AI हमारे जीवन में आ चुकी है या नहीं; प्रश्न यह है कि AI के इस युग में मनुष्य कहाँ खड़ा है?

तकनीक का इतिहास बताता है कि प्रत्येक नई खोज ने मनुष्य के श्रम को कम किया है। पहिए ने दूरी घटाई, मशीनों ने शारीरिक श्रम कम किया और कंप्यूटर ने गणनाओं को सरल बनाया। किंतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता पहली ऐसी तकनीक है जो मनुष्य की बौद्धिक क्षमता को चुनौती देती दिखाई देती है। यह चुनौती केवल रोजगार की नहीं है। यह चुनौती हमारी संवेदनशीलता की भी है।

आज सोशल मीडिया पर हजारों मित्र हैं, लेकिन संवाद कम हो रहे हैं। हम संदेशों के आदान-प्रदान में व्यस्त हैं, परंतु मन के आदान-प्रदान से दूर होते जा रहे हैं। एक क्लिक पर सैकड़ों शुभकामनाएँ मिल जाती हैं, परंतु कठिन समय में कंधा देने वाले लोग कम दिखाई देते हैं।

यदि संवेदनाएँ ही मौन हो जाएँ,
तो प्रगति का शोर भी व्यर्थ होगा। 

विडंबना यह है कि जितनी तेजी से संचार के साधन बढ़े हैं, उतनी ही तेजी से अकेलापन भी बढ़ा है। AI हमें उत्तर दे सकती है, लेकिन वह हमारे आँसू नहीं समझ सकती। वह कविता लिख सकती है, लेकिन कविता की पीड़ा को अनुभव नहीं कर सकती। वह प्रेमपत्र का प्रारूप बना सकती है, परंतु प्रेम की धड़कनें नहीं सुन सकती।

मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संवेदना है। यही संवेदना उसे मशीनों से अलग बनाती है। साहित्य का जन्म भी इसी संवेदना से हुआ है। कबीर की वाणी, प्रेमचंद की कहानियाँ, महादेवी वर्मा की वेदना और मुक्तिबोध की बेचैनी किसी एल्गोरिद्म का परिणाम नहीं थीं; वे मनुष्य के जीवंत अनुभवों की उपज थीं।

आज का युवा डिजिटल दुनिया में जी रहा है। उसकी मित्रता ऑनलाइन है, उसकी अभिव्यक्ति ऑनलाइन है और उसका संघर्ष भी ऑनलाइन दिखाई देता है। ऐसे समय में साहित्य की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। साहित्य हमें याद दिलाता है कि मनुष्य केवल सूचना का संग्रह नहीं है; वह भावनाओं, स्मृतियों, सपनों और संघर्षों का जीवंत संसार है।

हमें तकनीक का विरोध नहीं करना चाहिए। AI मानव प्रगति का महत्वपूर्ण साधन है। लेकिन यह भी आवश्यक है कि तकनीक हमारे विवेक की सेवक बने, स्वामी नहीं। भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं होगी कि मशीनें कितना सोच सकती हैं; बल्कि यह होगी कि मनुष्य कितना महसूस कर सकता है।

जब इतिहास इक्कीसवीं सदी के इस दौर को देखेगा, तब वह केवल तकनीकी उपलब्धियों को नहीं गिनेगा। वह यह भी पूछेगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उत्कर्ष के बीच क्या मनुष्य अपनी मानवीयता को बचा पाया था..?

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