गणेशोत्सव : उत्सव नहीं, आत्मजागरण का पर्व

गणेशोत्सव

णेशोत्सव का आगमन भारतीय जीवन में केवल हर्षोल्लास का क्षण नहीं, बल्कि आत्मिक नवचेतना का अवसर है। नगर की गलियों से लेकर गाँव के चौबारों तक, इस पर्व की ध्वनि केवल ढोल-ताशों में नहीं गूँजती, यह तो मनुष्य के अंतरतम में छुपे अदृश्य अंधकार को आलोकित करने वाली अनुभूति है।

“वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥”

गणपति विघ्नहर्ता हैं, परंतु उनका स्वरूप केवल विघ्न-निवारण तक सीमित नहीं। वे बुद्धि, विवेक और करुणा के दाता हैं। उनके विशाल गजानन में धैर्य और स्थिरता की प्रतिमा निहित है; उनकी सूँड की वक्रता हमें जीवन के टेढ़े-मेढ़े मार्गों को सहजता से पार करने की प्रेरणा देती है।

लोकमान्य तिलक ने जब गणेशोत्सव को सार्वजनिक रूप दिया, तब उन्होंने इसे केवल धार्मिक आस्था का साधन न मानकर राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक एकता का उत्सव बना दिया। आज भी यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि समाज की शक्ति एकता और सांस्कृतिक गौरव में निहित है।

“सिद्धिविनायकं नित्यं ध्यायन्ति ये द्विजोत्तमाः।
विद्या बुद्धिं बलं तेजः तैः सर्वं लभ्यते ध्रुवम्॥”

गणेशोत्सव हमें बताता है कि उत्सव का अर्थ केवल दीपक जलाना, आरती गाना और प्रतिमा सजाना नहीं है। इसका सच्चा उद्देश्य है – आत्मानुशासन, करुणा, नैतिकता और सामाजिक समरसता को अपने जीवन में उतारना। यदि हम केवल बाहरी आडंबर तक सीमित रह जाएँ और भीतर के दोषों से मुक्त न हों, तो गणेश पूजन अधूरा ही रह जाएगा।

गणपति की प्रतिमा मिट्टी से निर्मित होती है और अंततः जल में विसर्जित हो जाती है। यह प्रक्रिया हमें यह बोध कराती है कि जीवन का सत्य अनित्य है। रूप बदलता है, पर आत्मा शाश्वत रहती है। इस विसर्जन में ही स्थायित्व का रहस्य छुपा है- त्याग के माध्यम से ही जीवन की पूर्णता प्राप्त होती है।

“गजाननं भूतगणादि सेवितं,
कपित्थ जम्बूफलचारु भक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारणं,
नमामि विघ्नेश्वर पादपङ्कजम्॥”

गणेशोत्सव का चल रहा यह पावन अवसर हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार और स्वार्थ के विघ्नों का नाश करें और बुद्धि, विवेक तथा करुणा के मार्ग पर चलें। यही सच्ची आराधना है, यही सच्चा उत्सव है।

आइए, गणपति के इस महापर्व को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और आत्मजागरण का पर्व बनाएँ। जब गणेश हमारे हृदयों में प्रतिष्ठित होंगे, तभी उनका विसर्जन भी जीवन में नया प्रकाश बनकर उभरेगा।

डॉ. इंद्रकुमार विश्वकर्मा (प्रधान-सम्पादक)

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